नई दिल्ली: भैया, इंटरनेशनल लेवल पर भारत का जलवा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। और इस बार ये जलवा किसी फिल्म या गाने का नहीं, बल्कि हमारी धाकड़ मिसाइल 'ब्रह्मोस' का है। मंगलवार का दिन भारत के लिए वाकई बड़ा लकी साबित हुआ, जब एक और देश ने हमारी इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को खरीदने का पक्का इरादा कर लिया। पहले फिलीपींस और वियतनाम, और अब इस लिस्ट में नया नाम जुड़ा है इंडोनेशिया का। सोचिए, एक मिसाइल जो दुनिया में भूचाल लाने की ताकत रखती है, और उसे खरीदने के लिए दुनिया के देश कतार में लगे हैं!
ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं है बॉस। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच, जहां हर देश अपनी सुरक्षा को लेकर टेंशन में है, वहां भारत का ये हथियार दुनिया में एक नई पहचान बना रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता यात्रा के दौरान इस ऐतिहासिक समझौते का ऐलान किया गया, जिसने भारत को रक्षा निर्यातक के रूप में एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। ये कहानी सिर्फ हथियारों के सौदे की नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती ताकत और ग्लोबल मंच पर उसके बढ़ते कद की है।
तो आखिर ये ब्रह्मोस मिसाइल इतनी खास क्यों है?
आपको याद होगा, कुछ समय पहले 'ऑपरेशन सिंदूर' नाम की एक कहानी चली थी। इसमें भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एक एयरबेस पर अटैक करने के लिए ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल किया था।
उस ऑपरेशन ने दुनिया को दिखा दिया कि ये मिसाइल कितनी सटीक मारक क्षमता रखती है और कितनी लंबी दूरी तक अपने टारगेट को तबाह कर सकती है। उस एक एक्शन ने ही ब्रह्मोस का लोहा मनवा दिया था।
ये एक ऐसा हथियार है जो दुश्मन को सोचने का मौका भी नहीं देता।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के मुखिया जयतीर्थ जोशी ने पिछले महीने ही बताया था कि वियतनाम के साथ मिसाइल डील अपने आखिरी चरण में है। उन्होंने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया था कि बस थोड़ी-सी सरकारी मंजूरी बाकी है, और फिर वियतनाम भी हमारे इस खास दोस्त का नया खरीदार बन जाएगा।
जोशी ने ये भी इशारा किया था कि पूर्वी और पश्चिमी दोनों इलाकों के कई और देश भी इस मिसाइल को लेकर बातचीत कर रहे हैं। मतलब, मामला अभी और गर्म होने वाला है!
यहां तक कि हमारा पुराना दोस्त रूस भी, जो खुद इस मिसाइल कार्यक्रम में हमारा पार्टनर है, वो भी ब्रह्मोस का प्रोडक्शन बढ़ाना चाहता है। जोशी ने जून के एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि रूस भी मौजूदा हालात को देखते हुए इसकी जरूरत महसूस कर रहा है, और हम उनके साथ इस बारे में बातचीत कर रहे हैं।
तो आप समझ रहे हैं ना, जिस हथियार का जन्म ही भारत और रूस की दोस्ती से हुआ हो, वो आज दुनिया में कैसे अपनी धाक जमा रहा है।
क्या है इस धाकड़ मिसाइल की पूरी कुंडली?
ब्रह्मोस मिसाइल कोई अकेला प्लेयर नहीं है, बल्कि ये भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और रूस के एनपीओ माशिनोस्ट्रोयेनिया (NPO Mashinostroyenia) का मिला-जुला कमाल है। इसके नाम में भी भारत और रूस की दोस्ती छिपी है – भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी के नाम पर इसे 'ब्रह्मोस' नाम मिला है।
ये मिसाइल 'दागो और भूल जाओ' (Fire-and-Forget) सिद्धांत पर काम करती है। इसका मतलब है कि एक बार टारगेट लॉक करके दाग दिया, तो फिर आपको कुछ करने की जरूरत नहीं।
ये खुद अपने रास्ते से जाकर दुश्मन को खत्म कर देती है। इसमें दो स्टेज होते हैं।
पहले स्टेज में सॉलिड-फ्यूल बूस्टर इसे सुपरसोनिक स्पीड देता है, मतलब आवाज की गति से भी तेज। और फिर लिक्विड-फ्यूल रैमजेट इंजन इसे क्रूज स्टेज में बनाए रखता है, जिससे ये लगातार अपनी घातक रफ्तार से आगे बढ़ती है।
इसकी रफ्तार सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे – मैक 2.8! यानी आवाज की गति से लगभग तीन गुना तेज। इतनी तेज कि दुश्मन को सोचने और रिएक्ट करने का मौका ही नहीं मिलता।
और सबसे बड़ी बात, इसे जमीन, समुद्र, यहां तक कि पानी के नीचे से भी और हवा से भी लॉन्च किया जा सकता है। सोचिए, कितनी वर्सटाइल मिसाइल है ये!
ये मिसाइल सिर्फ एक हथियार नहीं, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक शक्ति का प्रतीक बन गई है। एक ऐसा समय था जब भारत हथियारों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता था, लेकिन अब हम खुद हथियार बना रहे हैं और दूसरों को बेच भी रहे हैं।
ये वाकई 'जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान' का साक्षात प्रमाण है। इंडोनेशिया का ये फैसला भारत के लिए एक बड़ी जीत है और दिखाता है कि आने वाले समय में हमारी रक्षा उद्योग और भी तेजी से आगे बढ़ने वाला है।
दुनिया के कई और देश भी इस क्लब में शामिल होने के लिए बेताब होंगे, ऐसी उम्मीद है।









































