दिल्ली: 7 जुलाई, 2026 का दिन सोने-चांदी के निवेशकों के लिए किसी झटके से कम नहीं रहा। जिन लोगों ने सोचा था कि पिछले हफ्ते की तेज़ी कायम रहेगी, उन्हें एक दिन में ही तगड़ी चोट लगी। ख़ासकर चांदी, जो देखते ही देखते 5,000 रुपये प्रति किलो तक फिसल गई। सोने की चमक भी लगातार दूसरे दिन फीकी पड़ती नज़र आई।
आप कहेंगे, भैया ये अचानक हुआ क्या? दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में स्पॉट गोल्ड 0.8 फ़ीसदी गिरकर 4,129.90 डॉलर प्रति औंस पर पहुँच गया। लेकिन असली धमाका तो चांदी ने किया, जहां स्पॉट सिल्वर 1.9 फ़ीसदी टूटकर 60.93 डॉलर प्रति औंस पर आ गया।
अब ज़रा सोचिए, एक तरफ़ जहां पिछले हफ़्ते सोना 2 फ़ीसदी से ज़्यादा चढ़ा था, वहीं इस हफ़्ते की शुरुआत से ही इसकी चाल ढीली पड़ गई। बाज़ार में एक सन्नाटा सा छा गया है कि आख़िर ये गिरावट कब थमेगी और निवेशकों को क्या करना चाहिए?
आख़िर क्यों इतनी तेज़ी से गिरी सोने-चांदी की चमक?
अगर आप सोच रहे हैं कि सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ही ऐसा हुआ, तो ऐसा नहीं है। भारत में भी वायदा बाज़ार यानी कमोडिटी एक्सचेंज MCX पर सोने और चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
गोल्ड फ़्यूचर्स 1.07 फ़ीसदी, यानी पूरे 1,567 रुपये गिरकर 1,45,350 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया।
लेकिन चांदी ने तो हद ही कर दी। सिल्वर फ़्यूचर्स में 2.16 फ़ीसदी की गिरावट देखने को मिली, जिसकी वजह से ये 5,096 रुपये टूटकर 2,30,979 रुपये प्रति किलो पर पहुँच गया।
ये आंकड़े सीधे-सीधे बता रहे हैं कि बाज़ार में एक बड़ा करेक्शन देखने को मिला है।
डॉलर की मज़बूती और अमेरिकी फेडरल रिज़र्व का क्या है कनेक्शन?
अब सवाल उठता है कि इस गिरावट के पीछे की असली वजह क्या है? एक्सपर्ट्स की मानें तो इसका एक बड़ा कारण डॉलर इंडेक्स में मज़बूती है। 7 जुलाई को डॉलर इंडेक्स 0.10 फ़ीसदी ऊपर चढ़ा।
आप सोचेंगे, डॉलर के मज़बूत होने से सोने पर क्या असर पड़ता है?
बात सीधी सी है, जब डॉलर मज़बूत होता है, तो बाकी करेंसी वाले देशों के लिए सोना ख़रीदना महंगा हो जाता है। ऐसे में सोने की डिमांड कम होती है और उसकी क़ीमतें गिर जाती हैं।
हालांकि, कुछ मार्केट एनालिस्ट ये भी कह रहे हैं कि ये गिरावट पिछले हफ़्ते की तेज़ी के बाद बाज़ार में एक तरह का कंसॉलिडेशन है, यानी कीमतें अपनी सही जगह पर आ रही हैं।
इसके अलावा, बाज़ार की नज़रें अब अमेरिकी केंद्रीय बैंक, यानी फेडरल रिज़र्व की बैठक के मिनट्स पर टिकी हैं। ये मिनट्स 8 जुलाई को जारी होंगे, जिससे पता चलेगा कि इनफ्लेशन (महंगाई) को लेकर फेडरल रिज़र्व क्या सोच रहा है और भविष्य में उनकी मौद्रिक नीति क्या होगी?
निवेशक अभी से सितंबर में इंटरेस्ट रेट बढ़ने का 56 फ़ीसदी अनुमान लगा रहे हैं। अब ये इंटरेस्ट रेट वाली बात भी सोने के लिए अहम है।
अगर फेडरल रिज़र्व इंटरेस्ट रेट बढ़ाता है, तो इसका सीधा नेगेटिव असर सोने की क़ीमतों पर पड़ेगा। क्योंकि जब इंटरेस्ट रेट बढ़ते हैं, तो लोग सोने जैसी ‘नॉन-यील्डिंग एसेट’ में निवेश करने के बजाय फिक्स्ड डिपॉजिट या बॉन्ड जैसी चीज़ों में पैसा लगाना ज़्यादा पसंद करते हैं, जहां उन्हें ज़्यादा रिटर्न मिलता है।
इसके उलट, जब इंटरेस्ट रेट कम होते हैं, तो सोने की चमक बढ़ जाती है।
क्या सोना अपने रिकॉर्ड स्तर से बहुत नीचे आ गया है?
अगर आप सोने की लंबी अवधि की चाल को देखें, तो पाएंगे कि इस साल की शुरुआत में सोने और चांदी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुँच गई थीं। लेकिन उसके बाद इनमें तेज़ी से गिरावट देखने को मिली है।
एक बड़ी वजह रही 28 फरवरी को अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुई लड़ाई। इस तनाव ने बुलियन बाज़ार पर दबाव बढ़ा दिया था।
आज की तारीख में सोना अपने रिकॉर्ड पीस से क़रीब 30 फ़ीसदी नीचे गिर चुका है। जून के महीने में भी सोने में क़रीब 14 फ़ीसदी की गिरावट आई थी, जिसने निवेशकों को चिंता में डाल दिया था।
एक्सपर्ट्स का मोटा-मोटा कहना है कि सोने में अब तेज़ी टिक नहीं पा रही है। और जैसा सोने के साथ हुआ है, कुछ वैसा ही हाल चांदी का भी है।
कुल मिलाकर, बाज़ार के जानकारों का मानना है कि आने वाले कुछ समय तक बुलियन (यानी सोना और चांदी) कंसॉलिडेशन फ़ेज में रह सकते हैं, मतलब कीमतें एक दायरे में घूमती रहेंगी। अब देखना ये होगा कि फेडरल रिज़र्व के मिनट्स क्या कहते हैं और उसके बाद सोने-चांदी की चाल किस तरफ़ मुड़ती है।





































