लंदन: आज के दौर में हर बड़ी कंपनी के बीच एक होड़ मची है कि कौन सबसे पहले और सबसे बेहतर तरीके से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अपने सिस्टम में फिट कर ले। इस रेस में कंपनियों ने एक नया दांव चलना शुरू किया है—'चीफ एआई ऑफिसर' (Chief AI Officer) की कुर्सी। लेकिन यहाँ एक बड़ा ट्विस्ट है। ज़्यादातर लोग सोच रहे हैं कि इस पोस्ट के लिए किसी बड़े टेक एक्सपर्ट या कोडिंग के जादूगर को लाया जाएगा, पर क्या वाकई ऐसा होना चाहिए?
इस चर्चा को हवा दी ग्लोबल बैंकिंग दिग्गज HSBC के एक फैसले ने। जब इस बैंक ने अपने पहले चीफ एआई ऑफिसर की नियुक्ति की घोषणा की, तो पूरी इंडस्ट्री में खलबली मच गई।
सबको लगा कि कोई ऐसा शख्स आएगा जो टेक्नोलॉजी का उस्ताद हो, लेकिन बैंक ने सबको चौंकाते हुए यह जिम्मेदारी डेविड राइस को सौंपी।
डेविड राइस कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि HSBC के 20 साल पुराने अनुभवी दिग्गज हैं और पहले बैंक के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) रह चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि एक ऑपरेशंस एक्सपर्ट को एआई की कमान क्यों सौंपी गई? क्या बैंक ने कोई गलती की या यह कोई मास्टरस्ट्रोक है?
क्या एआई सिर्फ एक तकनीकी जादू है?
मोटा-मोटी बात यह है कि आज के दौर में C-suites (कंपनी के बड़े अधिकारी) एआई की क्षमताओं को लेकर बेहद उत्साहित हैं। एजेंटिक एआई और एडवांस ऑटोमेशन जैसे टूल्स को देखकर सबको लग रहा है कि बस इसे लागू करते ही पूरा बिजनेस बदल जाएगा।
लेकिन असलियत थोड़ी अलग है।
बता दें कि एआई कोई ऐसी जादुई छड़ी नहीं है जिसे घुमाते ही सारी मुश्किलें खत्म हो जाएं। इसे एक उदाहरण से समझते हैं।
मान लीजिए आपके पास दुनिया की सबसे बेहतरीन फॉर्मूला वन कार है, लेकिन सिर्फ कार होने से आप रेस नहीं जीत जाते। जीत के लिए ड्राइवर, स्ट्रेटेजी और टीम का तालमेल जरूरी है।
ठीक वैसे ही, एआई अकेले किसी बिजनेस की समस्याओं को हल नहीं कर सकता।
सच तो यह है कि एआई किसी खराब बिजनेस मॉडल को ठीक नहीं करता, बल्कि वह उसकी कमियों को और ज्यादा उजागर कर देता है। अगर आपका इंटरनल सिस्टम ही बिखरा हुआ है, तो लाखों डॉलर की महंगी टेक्नोलॉजी लगाने से भी रणनीतिक बदलाव नहीं आएगा।
टेक एक्सपर्ट्स बनाम बिजनेस लीडर्स, कौन है बेहतर?
अक्सर देखा जाता है कि कंपनी के CTO (चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर) एआई के सबसे बड़े पैरोकार होते हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि उन्हें पता होता है कि इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कैसे करना है और इससे क्या हासिल किया जा सकता है।
लेकिन यहाँ एक बड़ा चैलेंज है।
एआई को लागू करना सिर्फ एक तकनीकी चुनौती नहीं है, बल्कि यह एक संगठनात्मक (Organizational) चुनौती है। जब बात पूरे संगठन के काम करने के तरीके को बदलने की आती है, तो वहां एक ऐसे लीडर की जरूरत होती है जो बिजनेस ऑपरेशंस को गहराई से समझता हो।
यही वजह है कि HSBC का फैसला काफी सही लगता है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने 20 साल तक बैंक के ऑपरेशंस संभाले हों, वह बेहतर जानता होगा कि एआई को कहाँ फिट करना है ताकि वह वास्तव में वैल्यू क्रिएट करे, न कि सिर्फ एक महंगा खिलौना बनकर रह जाए।
कुल मिलाकर, मामला यह है कि एआई का असली फायदा तब है जब उसे बिजनेस की जरूरतों के साथ जोड़ा जाए। अगर कंपनी सिर्फ टेक पर फोकस करेगी और ऑपरेशंस को नजरअंदाज करेगी, तो निवेश तो होगा लेकिन नतीजे शायद उम्मीद के मुताबिक न मिलें।
इसलिए, चीफ एआई ऑफिसर की भूमिका अब सिर्फ कोडिंग या डेटा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन का खेल बन चुका है।







































