देशभर: आपके किचन का बजट फिर से बिगड़ने वाला है क्या? अगर आप भी इस सवाल से परेशान हैं, तो सुनिए ये ख़बर, क्योंकि जिस तरह से चीजें चल रही हैं, जुलाई-अगस्त में आपकी तेल की बोतल महंगी हो सकती है! जी हां, खाने के तेल के दाम में एक बार फिर उछाल आने की आशंका है और इसकी वजह है हमारे देश के अन्नदाता, किसान और उन पर मेहरबान न होने वाला मानसून बाबा।
कहानी कुछ यूं है कि इस बार खरीफ सीज़न में तिलहन यानी तेल वाली फसलों की बुआई में बंपर गिरावट देखने को मिली है। कमजोर और देर से आए मानसून की वजह से जो तिलहन का कुल रकबा पिछले साल 109.27 लाख हेक्टेयर था, वो धड़ाम से गिरकर सिर्फ 66.31 लाख हेक्टेयर पर आ गया है।
मोटा-मोटी समझें तो करीब-करीब 40 फीसदी की सीधी गिरावट। इसका सीधा असर आपकी रसोई पर पड़ने वाला है, क्योंकि बुआई कम मतलब आगे चलकर पैदावार भी कम और फिर दाम बढ़ने की टेंशन तो बनती है न!
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क्या हुआ है और क्यों आई इतनी गिरावट?
दरअसल, इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून की चाल धीमी रही है। कई बड़े राज्यों में, जो तिलहन की खेती के लिए मशहूर हैं, वहां औसत से कम बारिश हुई।
किसानों को अपनी फसल बोने के लिए सही वक्त पर पानी नहीं मिला। इसका नतीजा ये हुआ कि तिलहन की फसलें, खासकर सोयाबीन और मूंगफली की खेती पर सबसे बुरा असर पड़ा है।
आंकड़ों पर गौर करें तो 5 जुलाई तक तिलहन की बुआई में कुल 17% की कमी आई है, जिसमें सिर्फ सोयाबीन की बुआई में 11% की गिरावट दर्ज की गई है।
सोयाबीन, जिसे हम 'पीला सोना' भी कहते हैं, उसकी बुआई सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। 5 जुलाई तक पूरे देश में सिर्फ 47.80 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर सोयाबीन बोया जा सका है।
याद रहे, पिछले साल इसी समय तक ये आंकड़ा 79.20 लाख हेक्टेयर था। और अगर आप पिछले पांच साल का औसत देखें, तो वो तो 128.71 लाख हेक्टेयर था! यानी इस बार हम औसत से कोसों दूर हैं।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे सोयाबीन उत्पादक राज्यों के कई इलाकों में किसान अभी भी आसमान ताक रहे हैं, कि कब झमाझम बारिश हो और वे बुआई कर पाएं। लेकिन अफ़सोस, महाराष्ट्र के कई हिस्सों और कर्नाटक में तो सोयाबीन बोने का सही समय अब लगभग निकल चुका है।
इसका मतलब साफ है कि अंतिम रकबा और कुल उत्पादन, दोनों में ही कमी आने वाली है।
मूंगफली का क्या हाल है?
मूंगफली, जो अपने स्वाद और तेल के लिए जानी जाती है, उसकी बुआई का हाल भी कुछ खास नहीं है। 5 जुलाई तक सिर्फ 16.93 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर मूंगफली बोई जा सकी है।
पिछले साल इसी पीरियड में ये आंकड़ा 28.00 लाख हेक्टेयर था। और अगर पिछले पांच साल का औसत देखें, तो वो 46.70 लाख हेक्टेयर बैठता है।
गुजरात समेत दूसरे प्रमुख मूंगफली उत्पादक इलाकों में भी बारिश की अनिश्चितता ने किसानों को परेशानी में डाल रखा है, जिसकी वजह से बुआई की रफ्तार वैसी नहीं रही, जैसी होनी चाहिए थी।
तो क्या खाने के तेल का दाम बढ़ना तय है?
अब सवाल ये कि क्या इन सब का असर सीधे हमारी थाली पर पड़ेगा? क्या खाने का तेल वाकई महंगा होने वाला है? इस पर सानविन ग्रुप के संदीप बजोरिया का कहना है कि बीते कुछ दिनों में बेशक अच्छी बारिश हुई है और इससे किसान सोयाबीन की बुआई बढ़ाएंगे। जून में मानसून कमजोर था, लेकिन जुलाई में अच्छा हो गया।
उन्होंने बताया कि बाजार में भी 2 रुपये का सुधार दिखा है, जबकि विदेशी मार्केट में भी पाम ऑयल की कीमतों में 20 डॉलर का सुधार आया है।
बजोरिया जी ने आगे कहा कि पिछले 3-4 दिनों से भारत में पाम ऑयल की मांग बढ़ी है। उनका मानना है कि आने वाले दो महीनों, यानी जुलाई और अगस्त में खाने के तेल की मांग अच्छी रहने वाली है।
उन्होंने उम्मीद जताई है कि इन दो महीनों में पाम के लिए स्थिति अच्छी रहेगी और कीमतें भी पहले से बेहतर रहेंगी। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगले दो महीनों में खाने के तेल की कीमतों में तेजी आएगी क्योंकि इंटरनेशनल मार्केट में सनफ्लावर ऑयल के दाम भी ऊपर चढ़े हैं।
कुल मिलाकर, मौजूदा स्थिति ये बताती है कि मानसून की बेरुखी ने तिलहन की फसलों पर गहरी चोट की है, जिसका सीधा असर आगे चलकर खाने के तेल की कीमतों पर दिख सकता है। किसान उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में और अच्छी बारिश हो, ताकि वे बची हुई बुआई का काम निपटा सकें।
लेकिन जो समय निकल गया है, उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। अब देखना ये है कि सरकार और बाजार, इस चुनौती से कैसे निपटते हैं और आम आदमी की रसोई का बजट कैसे बचाते हैं।






































