पटना: आजकल न, इनकम टैक्स का मौसम चल रहा है और इस बार एक नई हवा चली है – नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) की! ऐसा लग रहा है मानो हर कोई इसी की तरफ दौड़ रहा है। सरकार ने जब से ये नई रिजीम पेश की है, तब से नौकरीपेशा लोगों में इसे अपनाने की होड़ लगी है। क्यों न लगे भईया? सुनने में बड़ा आसान लगता है, टैक्स के रेट भी पुराने वाले से थोड़े कम दिखते हैं। लेकिन क्या इतनी आसानी से फैसला कर लेना सही है? कहीं ऐसा न हो कि कम टैक्स के चक्कर में आप अपना ही ज्यादा नुकसान करा बैठें?
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट खुद कह रहा है कि आप सिर्फ कम टैक्स स्लैब देखकर नई व्यवस्था मत चुनिए। आपकी सैलरी का ढांचा, आपने कहां-कहां निवेश कर रखा है, कौन-कौन सी छूट (Exemptions) आप लेते हैं और आपकी वित्तीय जिम्मेदारियां क्या हैं – ये सारी चीजें मिलकर तय करती हैं कि आपके लिए कौन सी टैक्स व्यवस्था सबसे बढ़िया रहेगी।
अंधाधुंध भीड़ का हिस्सा बनने से पहले, अपनी जेब का हिसाब-किताब लगाना बेहद जरूरी है।
तो कौन सी हैं वो 8 बातें, जिन पर ध्यान देना है जरूरी?
आज हम आपको बताएंगे उन 8 अहम बातों के बारे में, जिन पर नई टैक्स व्यवस्था चुनने से पहले आपको गौर करना ही चाहिए। वरना 'सस्ते का चक्कर, महंगा पड़े' वाला हिसाब हो सकता है, और आपकी टैक्स देनदारी घटने की बजाय बढ़ सकती है।
तो अपनी कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, क्योंकि अब हम आपको ये पूरा गणित समझाते हैं!
अगर आप किराए के घर में रहते हैं तो HRA का क्या होगा?
अगर आप किसी शहर में किराए के घर में रहते हैं और आपकी कंपनी से आपको HRA यानी हाउस रेंट अलाउंस मिलता है, तो पुरानी टैक्स व्यवस्था आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। इसमें अच्छा-खासा टैक्स बचता था, खासकर बड़े शहरों में जहां किराया ज्यादा होता है।
लेकिन दोस्तों, नई टैक्स व्यवस्था में ये HRA वाली छूट बिल्कुल खत्म हो जाती है। अब सोचिए, अगर आपका HRA एक बड़ी रकम है और नई व्यवस्था में जाने से आपको इस पर कोई छूट नहीं मिलेगी, तो आपकी टैक्स देनदारी कितनी बढ़ सकती है? इसका हिसाब लगाना सबसे पहले जरूरी है।
क्या आप घूमने-फिरने के लिए LTA का इस्तेमाल करते हैं?
ऐसे ही, अगर आप हर दो साल में LTA यानी लीव ट्रैवल अलाउंस क्लेम करते हैं और घूमने-फिरने का मजा लेते हुए उस पर टैक्स भी बचाते हैं, तो नई टैक्स व्यवस्था चुनने पर ये फायदा भी आपसे छिन जाएगा। कई लोग अपने परिवार के साथ यात्रा के लिए LTA का उपयोग करते हैं और इससे टैक्स में अच्छी बचत भी होती है।
तो भैया, एक बार कैलकुलेट कर लो, कहीं यात्रा का सुख टैक्स के दुःख में न बदल जाए। यह उन लोगों के लिए एक बड़ा पॉइंट है जो अक्सर ट्रैवल करते हैं।
टैक्स बचाने वाले निवेश यानी 80C का क्या करें?
अब आते हैं उस सेक्शन पर, जिस पर मिडिल क्लास की पूरी इकोनॉमी टिकी है – सेक्शन 80C! ये वो जादू की छड़ी है जिससे आप टैक्स बचाते थे। EPF (कर्मचारी भविष्य निधि), PPF (पब्लिक प्रोविडेंट फंड), ELSS (इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम), लाइफ इंश्योरेंस, टैक्स सेविंग FD, बच्चों की ट्यूशन फीस, होम लोन का मूलधन और तो और, सुकन्या समृद्धि योजना – इन सब में निवेश करके पुरानी व्यवस्था में अच्छी-खासी टैक्स छूट मिलती थी।
लेकिन अफसोस! नई व्यवस्था में इन सारे निवेशों पर कोई छूट नहीं मिलती। तो अगर आपने इनमें तगड़ा निवेश कर रखा है और टैक्स बचाना आपकी आदत है, तो नई व्यवस्था चुनने से पहले सौ बार सोचिएगा, वरना आपकी सारी प्लानिंग धरी की धरी रह जाएगी।
NPS का क्या पेच है और यह कैसे काम करता है?
नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में अगर आपकी कंपनी भी योगदान देती है, तो उस योगदान पर मिलने वाली टैक्स छूट नई व्यवस्था में भी जारी रहेगी। यह उन लोगों के लिए थोड़ी राहत की खबर है जिनकी कंपनी NPS में निवेश करती है।
लेकिन अगर आप खुद अपनी सैलरी से NPS में पैसा डालते हैं और उस पर अतिरिक्त छूट की उम्मीद करते हैं, तो नई व्यवस्था में वो नहीं मिलेगी। समझ रहे हो न बात की गहराई को? खुद के योगदान पर मिलने वाला अतिरिक्त लाभ नई व्यवस्था में नदारद है।
अगर होम लोन लिया है तो हिसाब लगाना क्यों है जरूरी?
अरे हां, अगर आपने अपने सपनों का घर बनाने के लिए होम लोन लिया है, तो पुरानी व्यवस्था में इसके मूलधन (Principal) और ब्याज (Interest) दोनों पर अच्छी टैक्स छूट मिलती थी। ये उन लोगों के लिए एक बड़ा फायदा था, जिनके पास होम लोन की EMI का बड़ा बोझ था।
होम लोन पर मिलने वाली ये छूट टैक्स बचाने का एक बड़ा जरिया थी। लेकिन नई व्यवस्था में घर के सपने को पूरा करने में ये वाला टैक्स फायदा नहीं मिलेगा।
तो भैया, जिनका होम लोन चल रहा है, वो तो पक्का हिसाब लगाएं कि उन्हें कितना नुकसान हो सकता है!
बच्चों की पढ़ाई और दूसरे सैलरी अलाउंस का क्या?
बच्चों की पढ़ाई का खर्च, उनके हॉस्टल का बिल, स्कूल ट्रांसपोर्ट अलाउंस – ये सब पुरानी व्यवस्था में टैक्स बचाने में मदद करते थे। कई सारे अलाउंस थे जो आपकी सैलरी का हिस्सा होते थे और उन पर टैक्स छूट मिलती थी।
नई व्यवस्था में इनमें से ज्यादातर छूट खत्म हो जाती हैं। अब बताओ, ये तो सीधे-सीधे आपके घर के बजट पर असर डालेगा न? खासकर उन परिवारों के लिए जिनके बच्चों की शिक्षा पर अच्छा-खासा खर्च होता है, उन्हें इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा।
फ्लेक्सिबल बेनिफिट प्लान (FBP) क्या चीज़ है और क्या मिलेगा फायदा?
कुछ कंपनियों में Flexible Benefit Plan (FBP) होता है, जिसमें आपको भोजन, फोन बिल, इंटरनेट, किताबें, प्रोफेशनल सब्सक्रिप्शन जैसे खर्चों का रीइंबर्समेंट मिलता है। इन पर टैक्स के नियम थोड़े पेचीदा हो सकते हैं और हर कंपनी या हर मामले में अलग हो सकते हैं।
तो अपनी सैलरी स्लिप को अच्छे से समझिए और देखिए कि FBP का आप पर क्या असर पड़ेगा। यह समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर आपकी कंपनी ऐसे लाभ देती है तो यह आपकी नेट इनकम को प्रभावित कर सकता है।
प्रोफेशनल टैक्स और रिटायरमेंट फंड का क्या हिसाब है?
कुछ राज्यों में कर्मचारियों से प्रोफेशनल टैक्स भी लिया जाता है। पुरानी टैक्स व्यवस्था में इसकी कटौती का लाभ मिलता था, जबकि नई व्यवस्था में आमतौर पर ये सुविधा नहीं होती।
ये भी एक छोटी, पर महत्वपूर्ण बात है। आखिरी बात, आपके रिटायरमेंट फंड जैसे EPF, NPS और सुपरएन्युएशन फंड में कंपनी का योगदान एक तय सीमा तक टैक्स फ्री होता है।
अगर ये सीमा पार होती है, तो अतिरिक्त रकम पर टैक्स देना पड़ सकता है। ये नियम दोनों ही टैक्स व्यवस्थाओं में लागू होता है।
तो भैया, रिटायरमेंट की प्लानिंग भी सोच-समझकर करिएगा और देखें कि कंपनी का योगदान कहीं तय सीमा से ज्यादा तो नहीं है!
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि नई टैक्स व्यवस्था लुभावनी तो है, लेकिन हर किसी के लिए फायदेमंद हो, ऐसा जरूरी नहीं। अपनी सैलरी स्ट्रक्चर को देखिए, अपने निवेशों को परखिए और अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों का पूरा हिसाब लगाइए।
तभी आप तय कर पाएंगे कि कौन सी व्यवस्था आपके लिए 'बल्ले-बल्ले' वाली है और कौन सी 'टेंशन' वाली। अंधाधुंध दौड़ में मत भागिए, अपनी जेब का गणित खुद समझिए, तभी आप टैक्स के खेल में विजेता बन पाएंगे!






































