देशभर में: आजकल की दुनिया में अगर कोई शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में है, तो वो है ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ यानी AI. जिधर देखो, उधर ही इसकी बातें हो रही हैं. कंपनियों में इसे अपनाने की होड़ मची है और हर कोई चाहता है कि उसका बिजनेस AI के दम पर आसमान छू ले. लेकिन क्या वाकई में ऐसा हो रहा है?
2026 में, बिजनेस की दुनिया में AI को लाना और उसे अपनी जड़ों में बैठाना एक बहुत बड़ा चैलेंज बन गया है. IT लीडर्स के बीच हुए एक ग्लोबल रिसर्च से जो आंकड़े सामने आए हैं, वो काफी चौंकाने वाले हैं.
रिसर्च कहता है कि 94% ऑर्गनाइजेशन AI को अपने सिस्टम में लगाना चाहते हैं. सोचिए, सिर्फ एक साल पहले, यानी 12 महीने पहले, ये आंकड़ा सिर्फ 12% था.
मतलब, AI को लेकर भूख जबरदस्त बढ़ी है.
लेकिन इस भारी-भरकम महत्वाकांक्षा के नीचे एक बड़ी खाई है, जिसे 'AI स्केलिंग गैप' कहा जा रहा है. कहने को तो सब AI अपनाना चाहते हैं, लेकिन उसे जमीन पर कैसे उतारें, इसकी साफ-साफ कोई रूपरेखा नहीं है.
ये ऐसा है जैसे आप दिल्ली से मुंबई जाना चाहते हैं, लेकिन आपके पास मैप नहीं है और आप बस ‘सीखते-सीखते’ आगे बढ़ रहे हैं.
तो, चुनौती क्या है और CIOs क्यों अटके हुए हैं?
कॉर्पोरेट जगत के बड़े-बड़े दिमाग, यानी चीफ इंफॉर्मेशन ऑफिसर (CIOs) AI में जमकर पैसा तो लगा रहे हैं, लेकिन उनका मौजूदा तरीका क्या है? वो इसे "सीखते हुए आगे बढ़ रहे हैं." मतलब, एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं.
कई CIOs तो यह भी मानते हैं कि उनके AI प्रोजेक्ट शुरुआती 'पायलट फेज' से आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हैं. सोचिए, एक बड़ा प्रोजेक्ट जो कंपनी का भविष्य बदल सकता है, वो बस एक छोटे से टेस्ट तक ही सिमट कर रह गया है.
इसे ही तो 'पायलट पर्गेटरी' कहते हैं, यानी पायलट प्रोजेक्ट्स की ऐसी दलदल, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है.
ये महत्वाकांक्षा और वास्तविक लागूकरण (स्केलिंग) के बीच का जो घर्षण है, उसने एक नई तरह की सतर्कता को जन्म दिया है. कई CIOs अब यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या AI को लेकर बाजार में जो 'हाइप' और 'मार्केट वैल्यूएशन' है, वो वाकई में उतना 'वैल्यू' डिलीवर कर पा रहा है, जितना बताया जा रहा है? कहीं हम बस भेड़चाल तो नहीं चल रहे?
क्यों फंस रहे हैं AI प्रोजेक्ट्स पायलट फेज में?
AI को लागू करने की इच्छा होना एक बात है, और उसे पूरे ऑर्गनाइजेशन में फैलाना बिल्कुल दूसरी. कंपनियों के पास अक्सर AI के लिए एक क्लियर स्ट्रेटेजी नहीं होती.
वे छोटे-छोटे टेस्ट प्रोजेक्ट्स तो शुरू कर लेते हैं, लेकिन फिर उन्हें कंपनी के बड़े सिस्टम के साथ कैसे इंटीग्रेट करें, कैसे डेटा को सही तरीके से मैनेज करें, और कैसे यह सुनिश्चित करें कि AI हर डिपार्टमेंट में कुशलता से काम करे, इन सवालों का जवाब नहीं होता.
डेटा की क्वालिटी, सही इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, AI से जुड़े स्किल्स वाले कर्मचारियों की कमी और प्राइवेसी व सिक्योरिटी से जुड़े मुद्दे भी प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ने से रोकते हैं. मान लीजिए आपने एक बेहतरीन AI मॉडल बनाया, लेकिन उसे चलाने के लिए आपके पास पर्याप्त कंप्यूटिंग पावर नहीं है या उसे संभालने वाले इंजीनियर नहीं हैं, तो क्या होगा? वो मॉडल बस अपनी प्रयोगशाला में ही पड़ा रह जाएगा.
इसके अलावा, बहुत सी कंपनियां 'AI फॉर AI' की सोच पर काम कर रही थीं. मतलब, सिर्फ AI को अपनाने के लिए उसे अपनाना.
लेकिन अब ये सोच बदल रही है. अब फोकस इस बात पर आ गया है कि AI से बिजनेस को क्या ठोस 'वैल्यू' मिल रही है.
अगर कोई AI प्रोजेक्ट कंपनी के रेवेन्यू में इजाफा नहीं कर रहा, कॉस्ट कम नहीं कर रहा या कस्टमर एक्सपीरियंस बेहतर नहीं बना रहा, तो उस पर पैसा क्यों लगाया जाए?
AI को लेकर यह थोड़ी-बहुत शंका होना दरअसल एक अच्छी बात है. यह दिखाता है कि हम सिर्फ एक्सपेरिमेंट के दौर से बाहर निकल रहे हैं और एक ज्यादा मैच्योर, 'वैल्यू-ड्रिवन' स्ट्रेटेजी की ओर बढ़ रहे हैं.
इसका मतलब है कि अब कंपनियां AI से सिर्फ 'क्या कर सकते हैं' से आगे बढ़कर 'हमें इससे क्या हासिल होगा' पर ध्यान दे रही हैं.
आगे का रास्ता क्या है और CIOs को क्या करना होगा?
एक्सपेरिमेंट के इस दौर से आगे बढ़ते हुए, आज के CIOs के सामने एक बहुत बड़ा चैलेंज है. उन्हें ऐसे मजबूत 'स्ट्रक्चरल' और 'एथिकल' फाउंडेशन बनाने होंगे, जिनसे AI न सिर्फ बिजनेस को 'वैल्यू' दे, बल्कि कंपनी के 'डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर' की लॉन्ग-टर्म स्थिरता से कोई समझौता भी न हो.
यह आसान नहीं है, पर नामुमकिन भी नहीं.
स्ट्रक्चरल फाउंडेशन का मतलब है एक मजबूत डेटा गवर्नेंस पॉलिसी बनाना, सही टेक्नोलॉजी स्टैक चुनना, और AI मॉडल्स को डिप्लॉय करने व मैनेज करने के लिए एक स्केलेबल आर्किटेक्चर तैयार करना. वहीं, एथिकल फाउंडेशन का मतलब है कि AI का इस्तेमाल जिम्मेदारी से हो.
डेटा प्राइवेसी का ख्याल रखा जाए, AI सिस्टम्स में कोई पूर्वाग्रह (बायस) न हो, और फैसले लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे. ये चीजें सिर्फ अच्छी बातें नहीं हैं, बल्कि बिजनेस के लिए अब ये बहुत जरूरी हो गई हैं.
CIOs को सिर्फ टेक्नोलॉजी पर ही नहीं, बल्कि लोगों पर भी निवेश करना होगा. सही स्किल्स वाले लोगों को हायर करना, मौजूदा कर्मचारियों को AI की ट्रेनिंग देना ताकि वे नए सिस्टम्स के साथ काम कर सकें, और एक ऐसी संस्कृति बनाना जहां इनोवेशन को बढ़ावा मिले, लेकिन साथ ही जोखिमों को भी समझा जाए.
कुल मिलाकर, AI को सिर्फ एक टूल की तरह नहीं, बल्कि बिजनेस के एक अभिन्न अंग की तरह देखना होगा, जो सोच-समझकर, योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए. तभी AI अपनी असली क्षमता दिखा पाएगा और कंपनियों को वो बढ़त दे पाएगा, जिसका वे सपना देख रही हैं.




































