दिल्ली: युद्ध के मैदान का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है, और ये बात हम नहीं कह रहे, बल्कि टेक्नोलॉजी की दुनिया के एक बड़े धुरंधर ने कही है। सोचिए ज़रा, एक ऐसी मशीन जो सिर्फ़ 5,000 डॉलर यानी क़रीब 4 लाख रुपये की हो, वो 50 लाख डॉलर (क़रीब 41 करोड़ रुपये) के भारी-भरकम टैंक को पलक झपकते ही मिट्टी में मिला सकती है! जी हां, गूगल के पूर्व सीईओ एरिक श्मिट ने ये बात कही है और इसने दुनियाभर में रक्षा विशेषज्ञों से लेकर आम लोगों तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
एरिक श्मिट ने बताया कि कैसे ड्रोन टेक्नोलॉजी ने आधुनिक युद्ध के समीकरणों को पूरी तरह से उलट दिया है। उनका कहना है कि पुराने ज़माने के भारी-भरकम टैंक, जो कभी युद्ध की रीढ़ माने जाते थे, अब ज़्यादातर बेकार हो चुके हैं।
ये सिर्फ़ बयान नहीं है, बल्कि भविष्य के युद्ध की एक साफ़ तस्वीर है, जहाँ कम लागत वाली तकनीक, महंगी और पारंपरिक सैन्य शक्ति पर भारी पड़ रही है।
एरिक श्मिट ने ये बातें कहां और कब कहीं?
ये बात तब की है जब एरिक श्मिट अक्टूबर 2024 में सऊदी अरब में हुई ‘फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव’ कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे। इस कॉन्फ्रेंस में दुनिया भर के बड़े टेक लीडर्स और निवेशक इकट्ठा होते हैं ताकि भविष्य की टेक्नोलॉजी और उसके असर पर चर्चा कर सकें।
वहीं पर श्मिट ने ड्रोन-आधारित युद्ध के बढ़ते चलन पर ज़ोर दिया और इसे पारंपरिक टैंकों और बख्तरबंद वाहनों से बिल्कुल अलग बताया। उनका ये बयान सुनकर लोग दंग रह गए।
श्मिट ने साफ़ शब्दों में कहा, "दुनिया में बहुत सारे टैंक हैं। अब वो टैंक बड़े पैमाने पर बेकार हो चुके हैं।
एक 5,000 डॉलर का ड्रोन, 50 लाख डॉलर के टैंक को बर्बाद कर सकता है। मैंने कहीं पढ़ा था कि अमेरिका के पास हज़ारों की संख्या में टैंक कहीं स्टोर किए गए हैं।
उन्हें बांट दो। उनकी जगह ड्रोन ख़रीदो।
असल में, 10 ख़रीदो, 20 ख़रीदो, 50 ख़रीदो, 100 ख़रीदो।"
इस बयान का सीधा सा मतलब ये था कि अब युद्ध के मैदान में पैसा या आकार नहीं, बल्कि दिमाग और तेज़ी मायने रखेगी। उनका जोर था कि पश्चिमी देशों को अब पुरानी पड़ चुकी टेक्नोलॉजी से आगे बढ़कर ड्रोन और ऐसी ही दूसरी संबंधित तकनीकों पर ध्यान देना चाहिए, जो नए तरह के युद्ध का केंद्र बन चुकी हैं।
एरिक श्मिट की इतनी बात में क्यों है दम?
अब आप सोचेंगे कि एरिक श्मिट की बात में इतना वज़न क्यों है? दरअसल, उनका टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में लंबा और शानदार करियर रहा है। उन्होंने एक दशक तक गूगल के सीईओ के तौर पर कंपनी को चलाया है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है।
गूगल छोड़ने के बाद भी वो चुप नहीं बैठे, बल्कि डिफेंस सेक्टर में टेक्नोलॉजी को लेकर काफी एक्टिव रहे हैं। उन्होंने अमेरिकी सरकार और सेना को टेक्नोलॉजी पर सलाह देने में अहम भूमिका निभाई है।
मार्च 2016 से श्मिट ने डिफेंस इनोवेशन बोर्ड (DIB) की अध्यक्षता की है। इस संस्था का मुख्य काम है टेक सेक्टर को पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मुख्यालय) से जोड़ना, ताकि नई-नई टेक्नोलॉजी को सेना में शामिल किया जा सके।
इसके अलावा, 2019 से 2021 के बीच, श्मिट ने 'नेशनल सिक्योरिटी कमीशन ऑन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (NSCAI) की सह-अध्यक्षता भी की। इस कमीशन का मकसद अमेरिकी राष्ट्रपति और कांग्रेस को भविष्य की रक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका पर सिफारिशें देना था।
यानी, एरिक श्मिट सिर्फ़ एक टेक सीईओ नहीं हैं, बल्कि वो डिफेंस टेक्नोलॉजी के गहरे जानकार भी हैं और उन्होंने अमेरिकी सैन्य रणनीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में उनकी बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
युद्ध के मैदान में ड्रोन का बढ़ता वर्चस्व, क्या संकेत दे रहा है?
अगर आप हाल के संघर्षों पर नज़र डालें, तो ड्रोन का बढ़ता वर्चस्व साफ़ दिखाई देता है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से, हमने देखा है कि कैसे छोटे, सस्ते ड्रोन ने पारंपरिक सैन्य रणनीति को धता बता दिया है।
2022 में शुरू हुए इस बड़े पैमाने के युद्ध में, ड्रोन ने टोही (reconaissance) से लेकर दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने तक, हर जगह अपनी अहमियत साबित की है।
यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को दिखा दिया कि कैसे 5000 डॉलर का एक छोटा हॉर्नेट ड्रोन, 5 किलोग्राम विस्फोटक लेकर 200 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है और दुश्मन के बड़े से बड़े लक्ष्य को तबाह कर सकता है। श्मिट के बयान, यूक्रेन में ड्रोन के इस्तेमाल के ढाई साल बाद आए हैं, जिसने उनके आकलन को और भी पुख़्ता कर दिया है।
कम लागत और ज़्यादा नुक़सान का अनुपात (cost-to-damage ratio) drones को बेहद प्रभावी बनाता है। एक तरफ़ जहां एक टैंक बनाने में अरबों-खरबों रुपये लगते हैं और उसकी मरम्मत भी महंगी होती है, वहीं ड्रोन सस्ते होते हैं और इन्हें बड़ी संख्या में तैनात किया जा सकता है।
अगर एक ड्रोन नष्ट भी हो जाता है, तो भी दुश्मन को हुए नुक़सान के सामने उसकी कीमत बहुत कम होती है।
पुराने हथियारों का क्या होगा?
श्मिट की बात को अगर आगे बढ़ाएं तो सवाल उठता है कि क्या दुनिया की सेनाओं को अब अपने पुराने और महंगे हथियारों को कबाड़ में बदल देना चाहिए? उनका सीधा इशारा था कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को अब सिर्फ़ पुराने हथियारों पर भरोसा करने के बजाय, नए ज़माने की टेक्नोलॉजी, खासकर ड्रोन और AI-आधारित सिस्टम पर ज़्यादा इन्वेस्ट करना चाहिए।
कुल मिलाकर, एरिक श्मिट का ये बयान सिर्फ़ एक भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि दुनिया को एक चेतावनी भी है कि अगर हमें भविष्य के युद्धों के लिए तैयार रहना है, तो हमें अपनी सोच और अपनी सैन्य रणनीति, दोनों को बदलना होगा। अब लड़ाई ताकत की नहीं, बल्कि तेज़ी, दिमाग और कम लागत वाली सटीक टेक्नोलॉजी की होगी।
आने वाले वक़्त में यही तय करेगा कि युद्ध के मैदान का असली किंग कौन होगा।







































