जेनेवा: कल्पना कीजिए कि दुनिया का हर एक इंसान किसी न किसी तरह इस बीमारी की चपेट में होगा। सुनने में यह किसी डरावनी फिल्म की कहानी जैसा लगता है, लेकिन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन यानी WHO की नई रिपोर्ट कुछ ऐसा ही इशारा कर रही है। रिपोर्ट की मानें तो आने वाले समय में कैंसर का खतरा इतना बढ़ जाएगा कि लगभग हर शख्स पर इसका असर पड़ेगा। चाहे वो खुद मरीज हो या फिर परिवार का कोई करीबी सदस्य, इस बीमारी का साया हर किसी के सिर पर मंडराएगा।
आंकड़े इतने डराने वाले हैं कि आपका सिर चकरा जाएगा। अभी जहाँ हर साल करीब 2.06 करोड़ नए मामले सामने आते हैं, वहीं अनुमान है कि साल 2050 तक यह संख्या बढ़कर 3.5 करोड़ तक पहुंच सकती है।
यानी आने वाले सालों में कैंसर के मरीजों की भीड़ और ज्यादा बढ़ने वाली है।
सबसे बड़ी टेंशन वाली बात यह है कि हर पांच में से एक व्यक्ति को अपनी जिंदगी में कभी न कभी कैंसर होने का खतरा है। और अगर हम परिवार की बात करें, तो करीब 92 प्रतिशत लोग ऐसे होंगे जिनके परिवार का कोई न कोई सदस्य इस बीमारी से जूझ रहा होगा।
यानी यह बीमारी अब सिर्फ एक मेडिकल कंडीशन नहीं, बल्कि एक सामाजिक संकट बनती जा रही है।
हर दिन 26 हजार मौतें, आखिर क्या है पूरा गणित?
WHO और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने मिलकर जो रिपोर्ट जारी की है, वह बताती है कि मौत के कारणों में कैंसर अभी भी दूसरे नंबर पर है। मोटे-मोटी बात यह है कि हर साल करीब 1 करोड़ लोग इस बीमारी की वजह से दुनिया छोड़ देते हैं।
अगर इसे दिन के हिसाब से देखें, तो हर दिन 26 हजार से ज्यादा मौतें हो रही हैं।
दिक्कत सिर्फ मौतें नहीं हैं, बल्कि वह मानसिक और आर्थिक बोझ है जो एक परिवार झेलता है। इलाज का खर्च और बीमारी का तनाव पूरे परिवार की कमर तोड़ देता है।
अमीर और गरीब देशों के बीच का यह फासला क्यों?
रिपोर्ट में एक बहुत ही कड़वा सच सामने आया है—इलाज की असमानता। अगर आप किसी अमीर देश में हैं, तो बचने की उम्मीद ज्यादा है, लेकिन गरीब देशों में कहानी बिल्कुल अलग है।
उदाहरण के लिए, ब्रेस्ट कैंसर की बात करें तो हाई इनकम वाले देशों में 87 प्रतिशत महिलाएं इलाज के बाद पांच साल या उससे ज्यादा समय तक जीवित रहती हैं। वहीं, कम आय वाले देशों में यह आंकड़ा गिरकर सिर्फ 42 प्रतिशत रह जाता है।
सोचिए, सिर्फ इसलिए कि कोई गरीब देश में पैदा हुआ, उसके बचने की संभावना आधी रह जाती है? यह सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता है। WHO का कहना है कि दुनिया के एक तिहाई से भी कम देशों ने अपनी हेल्थ स्कीम में कैंसर के इलाज को पूरी तरह शामिल किया है।
नतीजा यह है कि समय पर जांच नहीं हो पाती और जब तक पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
दवाइयां क्यों नहीं पहुंच रहीं मरीजों तक?
सिर्फ अस्पताल ही नहीं, दवाओं का खेल भी अजीब है। रिपोर्ट के मुताबिक, कैंसर की 20 सबसे जरूरी दवाओं की उपलब्धता में जमीन-आसमान का अंतर है।
अमीर देशों में ये दवाएं 68 से 94 प्रतिशत तक उपलब्ध हैं, लेकिन निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में यह उपलब्धता महज 9 से 54 प्रतिशत के बीच है।
विशेषज्ञों का सीधा कहना है कि दुनिया में नई तकनीकें तो आ रही हैं, महंगी दवाएं भी बन रही हैं, लेकिन जब तक ये सुविधाएं आम आदमी की पहुंच में नहीं आएंगी, तब तक कैंसर से यह जंग जीतना नामुमकिन है।
आखिर क्यों बढ़ रहे हैं कैंसर के मामले?
अब सवाल यह उठता है कि अचानक कैंसर इतना कॉमन क्यों होता जा रहा है? एक्सपर्ट्स बताते हैं कि हमारी लाइफस्टाइल और पर्यावरण ने मिलकर यह माहौल बनाया है।
- बढ़ता मोटापा: खान-पान की गलत आदतों की वजह से मोटापा बढ़ रहा है, जो कैंसर का बड़ा रिस्क फैक्टर है।
- फिजिकल एक्टिविटी की कमी: दिन भर कुर्सी पर बैठे रहना और व्यायाम न करना शरीर को कमजोर बना रहा है।
- असंतुलित डाइट: जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा इस्तेमाल।
- प्रदूषण: हवा और पानी में घुलता जहर फेफड़ों और अन्य अंगों को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है।
कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट एक चेतावनी है कि अगर हमने अपनी आदतों को नहीं बदला और हेल्थ सिस्टम को नहीं सुधारा, तो यह चुनौती और भी विकराल हो जाएगी।







































