पुरी: भैया, जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा का इंतज़ार तो पूरे देश को रहता है. लाखों लोग इस ऐतिहासिक और धार्मिक आयोजन का हिस्सा बनने के लिए दूर-दूर से ओडिशा पहुंचते हैं. इस बार भी तैयारियां ज़ोरों पर हैं, कारीगर दिन-रात रथों को तैयार करने में लगे हैं. लेकिन इस बीच एक ऐसी खबर आई है, जिसने पूरे धार्मिक माहौल में थोड़ी खलबली मचा दी है. खलबली मचाने वाले कोई और नहीं, बल्कि खुद पुरी के गजपति महाराज और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति (SJTMC) के अध्यक्ष दिब्यसिंह देब हैं. उन्होंने इस्कॉन (ISKCON) से एक ख़ास अपील की है. ये अपील है रथयात्रा के समय को लेकर. गजपति महाराज का कहना है कि इस्कॉन गलत समय पर रथयात्रा का आयोजन कर रहा है, जिससे भक्तों की भावनाएं आहत हो रही हैं. अब सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या हो गया, जो जगन्नाथ पुरी के राजा को इस तरह पत्र लिखना पड़ गया?
असल में मामला सीधा-सीधा धार्मिक परंपराओं और शास्त्रों के पालन से जुड़ा है. ओडिशा के पुरी शहर में इस साल मुख्य रथयात्रा का आयोजन 16 जुलाई को होने वाला है.
हिंदू पंचांग के हिसाब से, रथयात्रा हमेशा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि पर ही निकलती है. इससे पहले, 29 जून को स्नान पूर्णिमा मनाई गई थी.
ये सब तो अपनी जगह सही है, लेकिन पुरी के गजपति महाराज को इस्कॉन के दुनिया भर में हो रहे रथयात्रा आयोजनों के समय को लेकर सख्त एतराज़ है. उन्होंने मायापुर में इस्कॉन की गवर्निंग बॉडी कमीशन (GBC) के चेयरमैन श्री मधुसेविता दास प्रभु के नाम एक चिट्ठी लिखी है.
इस चिट्ठी में उन्होंने इस्कॉन के अक्टूबर 2025 में लिए गए एक फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा है, जिसके तहत विदेशों में अलग-अलग समय पर रथयात्राएं निकाली जा रही हैं.
क्यों उठी आपत्तियां: समय और परंपरा का पेंच
गजपति महाराज दिब्यसिंह देब ने अपनी चिट्ठी में साफ-साफ कहा है कि इस्कॉन शास्त्रों में बताई गई तिथियों का पालन नहीं कर रहा है. इसके कुछ ताज़े उदाहरण भी हैं.
जैसे, हाल ही में केन्या की राजधानी नैरोबी में इस्कॉन ने अपनी रथयात्रा निकाली. इससे पहले, 21 जून को लंदन में, 14 जून को न्यूयॉर्क सिटी में और 5 जुलाई को सिडनी में भी रथयात्रा का आयोजन किया गया.
ये सभी तारीखें उस निर्धारित तिथि से अलग हैं, जिस पर मुख्य रथयात्रा पुरी में निकाली जाती है. गजपति महाराज का तर्क है कि जब जगन्नाथ पुरी में एक निश्चित तिथि पर ये उत्सव मनाया जाता है, तो फिर दुनिया के बाकी हिस्सों में इस्कॉन मनमर्ज़ी से अलग-अलग दिन इसे क्यों आयोजित कर रहा है?
बात सिर्फ रथयात्रा के समय तक ही सीमित नहीं है, स्नान यात्रा को लेकर भी कुछ ऐसी ही दिक्कतें सामने आई हैं. इस्कॉन ने पहले पुरी मंदिर प्रशासन को भरोसा दिलाया था कि स्नान यात्रा ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि पर ही मनाई जाएगी.
लेकिन हुआ क्या? दुनिया भर के कई शहरों में इस्कॉन ने इस त्योहार को अलग-अलग तारीखों पर आयोजित कर दिया. इस साल तो स्नान पूर्णिमा 29 जून को थी, लेकिन इस्कॉन ने 1 मई के बाद भी कई शहरों में स्नान यात्राएं कीं.
गजपति महाराज ने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए ऐसी स्नान यात्राओं की एक पूरी लिस्ट भी इस्कॉन को भेजी है. उन्होंने साफ़ तौर पर कहा है कि इस्कॉन यह सुनिश्चित करे कि दुनिया भर के उसके सभी मंदिर स्नान यात्रा केवल ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि पर ही मनाएं.
मध्य प्रदेश की रथयात्राओं पर भी सवाल
ये मामला सिर्फ विदेशों तक ही सीमित नहीं है, अपने देश में भी इस्कॉन के कुछ आयोजनों पर गजपति महाराज ने आपत्ति जताई है. उन्होंने उज्जैन स्थित इस्कॉन मंदिर की एक योजना पर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत मध्य प्रदेश के 66 अलग-अलग स्थानों पर 16 से 25 जुलाई के बीच रथयात्रा आयोजित करने की तैयारी है.
गजपति महाराज का कहना है कि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, रथयात्रा केवल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होने वाला 9 दिवसीय उत्सव है. इसे किसी और दिन या इतने लंबे अंतराल तक फैलाकर आयोजित करना ठीक नहीं है.
दिब्यसिंह देब ने यह भी ज़ोर देकर कहा कि महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित स्कंद पुराण में भी भगवान जगन्नाथ ने स्वयं स्नान यात्रा और रथयात्रा की निर्धारित तिथियां बताई हैं. ऐसे में अगर कोई संस्था मनमानी तिथियों पर इन आयोजनों को करती है, तो यह हमारी प्राचीन परंपराओं और शास्त्रों के एकदम उलट है.
उनकी चिंता यह भी है कि इस तरह से परंपराओं से खिलवाड़ करने से भक्तों की आस्था और भावनाएं आहत होती हैं.
इस्कॉन का अपना तर्क: क्या हैं मजबूरियां?
अब सवाल उठता है कि इस्कॉन का इस पूरे मामले पर क्या कहना है? पुरी मंदिर की पिछली आपत्तियों का जवाब देते हुए इस्कॉन ने कुछ तर्क पेश किए थे. उनका कहना है कि हर देश में जलवायु परिस्थितियां, वहां के सरकारी नियम-कानून और स्थानीय सांस्कृतिक कारक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
इन सब की वजह से शास्त्रों में बताई गई तारीख पर रथयात्रा आयोजित करना हमेशा संभव नहीं हो पाता है. इस्कॉन ने पुरी मंदिर को रूस का उदाहरण देते हुए बताया था कि वहां का मौसम, सरकार और स्थानीय संस्कृति अक्सर शास्त्रों में बताई गई तारीखों पर रथयात्रा निकालने के अनुकूल नहीं होती है.
यानी, इस्कॉन अपनी मजबूरियों का हवाला दे रहा है, लेकिन पुरी के गजपति महाराज और मंदिर प्रशासन इस तर्क को मानने को तैयार नहीं हैं. उनके लिए परंपरा और शास्त्र सर्वोपरि हैं.
आपको बता दें कि रथयात्रा को लेकर यह विवाद कोई नया नहीं है. इससे पहले भी, साल 2024 और 2025 में पुरी के गजपति महाराजा ने इस्कॉन से बार-बार अनुरोध किया था कि विदेशों में भी पुरी के धार्मिक पंचांग के अनुसार ही रथयात्रा का आयोजन किया जाए.
अब देखना होगा कि इस बार गजपति महाराज की इस अपील का इस्कॉन पर क्या असर होता है. इधर पुरी में मुख्य रथयात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में हैं, जहां बढ़ई, सहायक और पेंटर समेत करीब 220 कारीगर मिलकर तीनों रथों को अंतिम रूप देने में लगे हैं.






































