नई दिल्ली: कभी ऐसा लगा है कि आप किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कोई सर्विस लेने गए थे, किसी वेब सीरीज़ या फिल्म के लिए सब्सक्रिप्शन लिया, और पता चला कि आपसे जो वादा किया गया था वो कुछ और था? या फिर आपने ट्रायल पैक लिया और वो कब पूरी तरह से पैसे काटने वाला सब्सक्रिप्शन बन गया, आपको पता ही नहीं चला? अगर ऐसा आपके साथ हुआ है, तो जनाब आप अकेले नहीं हैं. एक बड़े सर्वे ने जो खुलासा किया है, वो चौंकाने वाला है. देश के करोड़ों लोग इन ऑनलाइन ‘फ्रॉड’ का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें तकनीकी भाषा में ‘डार्क पैटर्न’ कहा जाता है.
बात सिर्फ आपकी नहीं है, लोकलसर्किल्स नाम की एक संस्था ने बड़ा सर्वे किया है. इसमें सामने आया है कि भारत में 10 में से 8 लोग, यानी करीब 80% भारतीय यूजर ओटीटी (ओवर द टॉप) ऐप्स पर ऐसी चालाक भरी चालों, जिन्हें 'भ्रामक रणनीतियां' या 'डार्क पैटर्न' कहते हैं, उनका शिकार हो चुके हैं.
सोचिए, जब हम आराम से अपनी पसंद की फिल्म या शो देख रहे होते हैं, तब हमारी जेब पर कैसे चुपचाप डाका डाला जा रहा होता है.
आखिर क्या है ये 'डार्क पैटर्न' और किसने किया ये खुलासा?
ये सर्वे कोई छोटी-मोटी बात नहीं है. लोकलसर्किल्स ने देश के 324 जिलों से 1 लाख 18 हजार से भी ज्यादा लोगों से बात की, उनकी प्रतिक्रियाएं लीं.
इसमें 61% पुरुष थे और 39% महिलाएं. इन सभी ने लगभग एक ही कहानी सुनाई है – कि कैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उन्हें गुमराह किया गया.
ये 'डार्क पैटर्न' कुछ ऐसे डिजिटल डिजाइन होते हैं, जो यूजर को जानबूझकर ऐसे फैसले लेने पर मजबूर करते हैं, जिनसे कंपनी का तो फायदा होता है, लेकिन यूजर को या तो ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं या उसे वो सर्विस नहीं मिलती, जिसकी उसे उम्मीद होती है. ये यूजर की मर्जी के खिलाफ उसे मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रभावित करते हैं.
शिकायतें बढ़ती जा रही हैं और अब सरकार से मांग उठ रही है कि ओटीटी कंपनियों पर सख्ती की जाए और इन भ्रामक तरीकों पर रोक लगाई जाए. ये मांग इसलिए भी जायज़ है क्योंकि जब इतने बड़े पैमाने पर लोग ठगे जा रहे हैं, तो किसी न किसी को तो एक्शन लेना ही पड़ेगा.
और सरकार को भी इस पर गंभीरता से विचार करना होगा.
अमेजन प्राइम पर ऑस्ट्रेलिया में चला मुकदमा, भारत में भी है खतरा?
आपको लग रहा होगा कि ये सिर्फ भारत की बात है? ऐसा नहीं है. दुनिया भर में ऐसे मामलों पर नजर रखी जा रही है.
इसका एक बड़ा उदाहरण है ऑस्ट्रेलिया में अमेजन प्राइम वीडियो के खिलाफ दर्ज किया गया मुकदमा. कहानी कुछ यूं है कि अमेजन ने प्राइम सब्सक्रिप्शन में विज्ञापन दिखाना शुरू कर दिया.
मतलब, आपने पैसे दिए हैं विज्ञापन-मुक्त सेवा के लिए, और आपको विज्ञापन भी देखने पड़ रहे हैं!
ऑस्ट्रेलियाई नियामक संस्था का आरोप है कि अमेजन ने प्राइम सब्सक्रिप्शन की शर्तों में मनमाने ढंग से बदलाव किए हैं. 2024 में जब विज्ञापन शुरू हुए, तो 8.
5 लाख से ज्यादा ग्राहक ऐसे थे, जिन्होंने पहले ही पूरे साल की फीस दे दी थी. अब उनसे विज्ञापन-मुक्त सेवा के लिए और पैसे मांगे गए.
जो ग्राहक अतिरिक्त पैसे नहीं देना चाहते थे, उन्हें कंपनी ने कम सुविधाओं वाली सेवा देना शुरू कर दिया. मतलब, एक तरह से उन्हें ठगा गया, क्योंकि उन्होंने जिस सर्विस के लिए पैसे दिए थे, वो उन्हें पूरी नहीं मिली.
भारत में डार्क पैटर्न रोकने के लिए क्या नियम हैं?
अच्छी बात ये है कि भारत सरकार इस खतरे को पहचानती है और इस पर लगाम लगाने के लिए काम कर रही है. भारत में 30 नवंबर 2023 से 'डार्क पैटर्न रोकथाम एवं विनियमन दिशानिर्देश' लागू हैं.
ये दिशानिर्देश सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ही नहीं, बल्कि ई-कॉमर्स कंपनियों, ऐप्स, ट्रैवल, फूड डिलीवरी जैसी सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लागू होते हैं. मतलब सरकार ने एक बड़ा और जरूरी कदम उठाया है.
इन दिशानिर्देशों में कुल 13 तरह के 'डार्क पैटर्न' पर रोक लगाई गई है. इनमें से कुछ प्रमुख हैं:
- फॉल्स अर्जेंसी (False Urgency): जब आपको दिखाया जाता है कि ‘ऑफर बस कुछ मिनटों के लिए है’ या ‘सिर्फ 2 सीट बची हैं’, ताकि आप तुरंत फैसला ले लें, भले ही वो सच न हो.
- सब्सक्रिप्शन ट्रैप (Subscription Trap): यही वो है जहां ट्रायल आसानी से मिल जाता है, लेकिन उसे कैंसिल करना टेढ़ी खीर हो जाता है, और आपके पैसे कटते रहते हैं.
- ड्रिप प्राइसिंग (Drip Pricing): जब शुरुआत में कोई प्रोडक्ट सस्ता दिखाया जाता है, लेकिन पेमेंट करते वक्त उसमें कई हिडेन चार्जेस जुड़ जाते हैं, और कुल कीमत बहुत बढ़ जाती है.
- डिस्गाइज्ड एड (Disguised Ad): जब विज्ञापन को इस तरह पेश किया जाता है कि वो सामान्य कंटेंट लगे, ताकि आप उसे पहचान न पाएं.
- कन्फर्म शेमिंग (Confirm Shaming): जब यूजर को किसी ऑफर को मना करने पर शर्मिंदा महसूस कराया जाता है, जैसे ‘नहीं, मैं पैसे बचाना नहीं चाहता’.
- बैट एंड स्विच (Bait and Switch): जब किसी प्रोडक्ट या सर्विस को आकर्षक ऑफर के साथ दिखाया जाता है, लेकिन जब आप उसे लेने जाते हैं, तो आपको कोई दूसरा, कमतर प्रोडक्ट या सर्विस दी जाती है.
ये सभी ऐसे तरीके हैं जिनसे कंपनियां यूजर की जेब ढीली करती हैं और उन्हें अपनी मर्जी से चीजें खरीदने पर मजबूर करती हैं.
तो फिर यूजर खुद को कैसे बचाएं?
जब इतनी सारी कंपनियां 'डार्क पैटर्न' का इस्तेमाल कर रही हैं, तो हम यूजर क्या कर सकते हैं? कुछ आसान से तरीके हैं जिनसे आप खुद को बचा सकते हैं:
- ऑटो-रिन्यूअल बंद करें: कोई भी सब्सक्रिप्शन लेने से पहले और बाद में, ऑटो-रिन्यूअल का ऑप्शन जरूर देखें और उसे बंद कर दें. इससे आपकी मर्जी के बिना पैसे नहीं कटेंगे.
- भुगतान अलर्ट रखें: अपने बैंक या पेमेंट ऐप पर अलर्ट सेट करें, ताकि हर बार जब भी कोई भुगतान हो, आपको तुरंत जानकारी मिल जाए.
- ट्रायल की शर्तें पढ़ें: किसी भी फ्री ट्रायल को लेने से पहले उसकी नियम और शर्तें ध्यान से पढ़ें. अक्सर कैंसिलेशन की शर्तें बहुत पेचीदा होती हैं.
- कैंसिलेशन का स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखें: अगर आप कोई सर्विस कैंसिल करते हैं, तो उसका स्क्रीनशॉट या कन्फर्मेशन मेल संभाल कर रखें. अगर भविष्य में कोई दिक्कत आती है, तो ये सबूत के तौर पर काम आ सकता है.
डिजिटल दुनिया जितनी सुविधा दे रही है, उतने ही खतरे भी ला रही है. ऐसे में जागरूक रहना ही सबसे बड़ा बचाव है.
सरकार अपने स्तर पर नियम बना रही है, लेकिन यूजर के तौर पर हमें भी अपनी आंखें खुली रखनी होंगी.


