लखनऊ: कल्पना कीजिए एक ऐसी खेती की जहाँ ड्रोन खेतों की निगरानी कर रहे हों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तय करे कि फसल को कब पानी चाहिए और जीनोम एडिटिंग से ऐसी फसलें तैयार हों जो सूखे या बाढ़ में भी न मरें। सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन लखनऊ के सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI) में इसी 'नेक्स्ट-जेनरेशन एग्रीकल्चर' पर एक बड़ी चर्चा हुई। मौका था 9वें प्रो. केएन कौल स्मृति व्याख्यान का, जहाँ भविष्य की खेती का पूरा रोडमैप पेश किया गया।
इस खास कार्यक्रम के लिए हैदराबाद से अंतर्राष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक मुख्य वक्ता के तौर पर पहुंचे।
केएन कौल ब्लॉक के लोटस प्रेक्षागृह में जुटे वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के बीच उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब समय सिर्फ पेट भरने का नहीं, बल्कि पोषण, कमाई और पर्यावरण को बचाने का है। उन्होंने साफ कहा कि भारत ने अनाज के संकट से निकलकर अधिशेष राष्ट्र बनने तक का सफर तो तय कर लिया है, लेकिन अब चुनौती और भी बड़ी है।
संस्थान के निदेशक डॉ. ए.
के. शासनी ने कार्यक्रम की शुरुआत में प्रो.
केएन कौल को याद करते हुए कहा कि यह व्याख्यान श्रृंखला दरअसल प्रो. कौल की उस वैज्ञानिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक जरिया है, जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी।
खेती का बदलता स्वरूप और चुनौतियां
डॉ. हिमांशु पाठक ने अपने संबोधन में बताया कि भारत ने दुग्ध, मत्स्य, फल और सब्जी उत्पादन में जो मुकाम हासिल किया है, वह काबिले तारीफ है।
आज भारत कई कृषि उत्पादों के मामले में दुनिया के लिए एक बड़ा निर्यातक बन चुका है। लेकिन, उन्होंने एक चेतावनी भी दी।
डॉ. पाठक के मुताबिक, बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और प्राकृतिक संसाधनों का लगातार घटता स्तर कृषि के सामने सबसे बड़ी दीवार बनकर खड़ा है।
उन्होंने विस्तार से समझाया कि अब हमें ऐसी कृषि व्यवस्था की जरूरत है जो न केवल उत्पादक हो, बल्कि किसानों के लिए लाभकारी और पर्यावरण के लिए टिकाऊ भी हो। यानी ऐसी खेती जिससे किसान की जेब भी भरे और धरती का स्वास्थ्य भी खराब न हो।
तकनीक जो लाएगी क्रांति
डॉ. पाठक ने उन मॉडर्न टूल्स की लिस्ट गिनाई जो आने वाले समय में खेती की शक्ल बदल देंगे।
उन्होंने बताया कि भविष्य की खेती में इन तकनीकों का रोल सबसे अहम होगा:
- जीनोम एडिटिंग: जिससे फसलों की क्वालिटी और मजबूती बढ़ाई जा सके।
- AI और रोबोटिक्स: खेती के कामों को सटीक और आसान बनाने के लिए।
- ड्रोन और रिमोट सेंसिंग: खेतों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए।
- बिग डेटा एनालिटिक्स: मौसम और मिट्टी के डेटा के आधार पर सटीक फैसले लेने के लिए।
- प्रिसिजन एग्रीकल्चर: कम संसाधनों में अधिकतम पैदावार हासिल करने की तकनीक।
डॉ. पाठक ने जोर दिया कि अगर हमें 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य को हासिल करना है, तो हमें डिजिटल कृषि और स्मार्ट कृषि परामर्श सेवाओं को जमीनी स्तर तक पहुँचाना होगा।
उन्होंने कहा कि अनुसंधान संस्थानों, इंडस्ट्री और किसानों के बीच एक मजबूत साझेदारी होनी चाहिए ताकि लैब में होने वाले प्रयोग सीधे खेतों तक पहुँच सकें। जलवायु-अनुकूल फसलों का विकास ही वह रास्ता है, जिससे भारत की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है।




































