लखनऊ: शनिवार की सुबह थी। धूप अभी पूरी तरह खिली नहीं थी। लखनऊ के हुसैनगंज इलाके में रहने वाले जीतू सोनकर अपने रोज़ाना के नियम के हिसाब से उठे और अपनी पांचवीं मंजिल पर स्थित घर की छत पर टहलने निकल पड़े। कौन जानता था कि सुबह की ये ताज़ी हवा और छत की सैर, उनकी ज़िंदगी की आखिरी सैर साबित होगी? एक ऐसा हादसा जिसने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया और शहर में बरसों से चले आ रहे एक खौफनाक 'आतंक' की पोल खोल दी।
फूलबाग के रहने वाले 40 वर्षीय जीतू सोनकर पेशे से ई-रिक्शा चालक थे। उनकी कमाई से ही घर चलता था।
हर दिन की तरह शनिवार को भी वह अपनी दिनचर्या शुरू करने जा रहे थे। छत पर कुछ पल बिताने के बाद ही अचानक उनका सामना बंदरों के एक बड़े झुंड से हो गया।
ये वही बंदर थे, जिनका आतंक हुसैनगंज और आसपास के इलाकों में सालों से चला आ रहा है। जैसे ही बंदरों ने उन्हें घेरा, जीतू अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे।
एक पल की चूक और उनका संतुलन बिगड़ गया। देखते ही देखते जीतू पांचवीं मंजिल से सीधे नीचे आ गिरे।
खून से लथपथ जीतू और परिवार का आरोप
छत से नीचे गिरने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि आसपास के लोग तुरंत मौके पर जमा हो गए। जिसने भी देखा, उसके रोंगटे खड़े हो गए।
जीतू खून से लथपथ ज़मीन पर पड़े थे। आनन-फानन में परिवार और पड़ोसी उन्हें बलरामपुर अस्पताल ले गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
डॉक्टरों ने उन्हें देखते ही मृत घोषित कर दिया। अस्पताल में मौजूद जीतू के बड़े भाई रवि सोनकर का गुस्सा और दुख शब्दों में बयां करना मुश्किल था।
उनकी आँखें नम थीं, लेकिन ज़ुबान पर कड़वी सच्चाई थी। रवि ने बताया कि इलाके में बंदरों का आतंक कोई नया नहीं है।
सालों से ये समस्या लोगों की जान को खतरा बनी हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि नगर निगम और वन विभाग, दोनों को कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन किसी ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
रवि का साफ कहना था, "अगर समय रहते प्रशासन ने कार्रवाई की होती, तो आज मेरे भाई की जान बच जाती।"
प्रशासन की ढिलाई और बढ़ता खौफ
इस हादसे की खबर मिलने के बाद कैसरबाग पुलिस भी बलरामपुर अस्पताल पहुंची। पुलिस ने परिवार से पूछताछ की और जीतू के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
पुलिस का कहना है कि वे पूरे मामले की जांच कर रहे हैं। लेकिन यह सिर्फ एक मौत का मामला नहीं है, यह एक बड़े सामाजिक और प्रशासनिक फेलियर का प्रतीक है।
लखनऊ में बंदरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इनका आतंक अब जानलेवा साबित हो रहा है। हुसैनगंज तो बस एक उदाहरण है, पूरा शहर इस समस्या से जूझ रहा है।
पुराने लखनऊ के कैसरबाग, चौक, अमीनाबाद से लेकर नए इलाकों जैसे आलमबाग, चारबाग, गोमतीनगर, इंदिरानगर, अलीगंज, महानगर, राजाजीपुरम, जानकीपुरम, आशियाना, विकासनगर, निरालानगर और डालीगंज तक, हर जगह लोग बंदरों के इस बढ़ते खौफ से परेशान हैं।
छत पर जाना भी हुआ जान का जोखिम
शहर के लोगों की ज़िन्दगी में बंदरों ने इस कदर खलल डाल दिया है कि उनके रोज़ाना के काम भी अब सुरक्षित नहीं रहे। सुबह-शाम छत पर टहलना, कपड़े सुखाने जाना, यहाँ तक कि बच्चों का बाहर खेलना भी अब जोखिम भरा हो गया है।
कई घरों में अब बच्चे अकेले छत या बालकनी में जाने से डरते हैं। ये स्थिति उन लोगों के लिए और भी भयावह है जो ऊंची इमारतों में रहते हैं, जहाँ बंदरों का हमला कहीं ज़्यादा खतरनाक हो सकता है।
यह सिर्फ डराने की बात नहीं है, जीतू सोनकर की मौत इस बात का जीता-जागता सबूत है कि यह खतरा कितना वास्तविक है।
लोग खुद कर रहे बचाव के उपाय
जब प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली, तो लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए खुद ही जुगाड़ लगाने शुरू कर दिए हैं। आलम यह है कि कई मकानों की छतों और बालकनियों पर अब लोहे की जाली लगाई जा रही है।
खिड़कियों पर मज़बूत ग्रिल और नेट लगवाए जा रहे हैं, ताकि बंदर घरों में न घुस पाएं। कुछ लोग तो और भी रचनात्मक तरीके अपना रहे हैं।
छतों पर कांटेदार प्लास्टिक स्ट्रिप, चमकीली टेप लगाई जा रही है, जो बंदरों को पास आने से रोके। सबसे दिलचस्प उपाय यह है कि कुछ लोगों ने बंदरों को डराने के लिए नकली लंगूर के पुतले तक लगा रखे हैं।
कई घरों में अब बड़े-बुज़ुर्ग छत पर लाठी लेकर जाते हैं, और छोटे बच्चों को तो बिल्कुल भी अकेले छत पर नहीं भेजा जाता। ये सारे इंतज़ाम बताते हैं कि लोग कितने बेबस हैं और उन्हें खुद ही अपनी सुरक्षा का ज़िम्मा उठाना पड़ रहा है।
पहले भी हो चुके हैं कई खूनी हादसे
लखनऊ में बंदरों के कारण हुए हादसे कोई नई बात नहीं हैं। जीतू सोनकर की मौत तो बस इस लिस्ट में जुड़ा एक और नाम है।
शहर में पहले भी कई लोग बंदरों के हमलों या उनसे बचने की कोशिश में घायल हो चुके हैं। कई मामलों में लोग छत से गिरकर, सीढ़ियों से फिसलकर या यहां तक कि सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हुए हैं, जब बंदरों से बचने की कोशिश में वे भागते हुए वाहनों की चपेट में आ गए।
इसके अलावा, बंदरों के काटने और नोचने के मामले तो हर साल बड़ी संख्या में अस्पतालों में रिपोर्ट होते हैं। चिकित्सक भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि इन हमलों के कारण गंभीर चोटें और संक्रमण का खतरा बना रहता है।
जीतू सोनकर की मौत ने एक बार फिर इस गंभीर समस्या पर ध्यान दिलाया है और अब यह देखना बाकी है कि प्रशासन इस 'बंदर आतंक' से शहर को कब निजात दिलाता है।





































