दिल्ली: अक्सर आपने कंपनियों में देखा होगा कि जब कोई बड़ा मामला या टेक्निकल दिक्कत आती है, तो एक बारगी तो सब उसे ठीक करने में लग जाते हैं। आग बुझाई जाती है, सिस्टम वापस पटरी पर लाया जाता है। लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू होता है। यानी उस घटना से क्या सीखा गया? सीखने का ये तरीका ही तय करता है कि कोई कंपनी कितनी मज़बूत है और कितनी दूर तक जाएगी। लेकिन अफ़सोस, ज़्यादातर कंपनियों में सीखने का ये इंतज़ाम आज भी अधकचरा है, यानी 'लोक कथाओं' के भरोसे चल रहा है।
सोचिए, किसी कंपनी में कोई बड़ा सर्वर डाउन हो गया। तुरंत इंजीनियर्स की फौज लग गई, सबने मिलकर रात-दिन एक कर दिया और मामला सुलझ गया।
वाहवाही हुई, शाबाशी मिली। लेकिन इसके बाद क्या? क्या इस बात पर गंभीर मंथन हुआ कि ऐसा क्यों हुआ, इसे रोकने के लिए आगे क्या करना है? या फिर बस कुछ लोगों ने चाय पर चर्चा की और बात आई-गई हो गई? यही वो बारीक लाइन है, जो अच्छी और बेहतरीन कंपनियों को अलग करती है।
हादसे से सीखने का पुराना तरीका कितना सही है?
आपको बता दें कि जो टीमें किसी भी घटना से बेहतरीन तरीके से उबरती हैं, वो सिर्फ़ मौके पर तेज़ी से रिस्पॉन्ड करने वाली नहीं होतीं, बल्कि वो होती हैं जो तात्कालिक दबाव ख़त्म होने के बाद चीज़ों को सीखती हैं और उनसे मज़बूत बनती हैं। ज़ाहिर सी बात है, घटना के बाद सब कुछ शांत हो जाने पर जो सीखने की प्रक्रिया अपनाई जाती है, वही असली गेम चेंजर होती है।
लेकिन ज़्यादातर संगठनों में ये सीखने की प्रक्रिया अभी भी बहुत ज़्यादा अनौपचारिक है। मतलब, क्या हुआ, कैसे हुआ, इसकी जानकारी सिर्फ़ सहकर्मियों के बीच बातचीत में दब जाती है।
कभी किसी चैट थ्रेड में खो जाती है, या फिर सिर्फ़ उन लोगों को याद रहती है जो उस वक़्त मौके पर मौजूद थे। ये बिल्कुल ऐसा है जैसे आप कोई ज़रूरी जानकारी किसी व्हाट्सऐप ग्रुप में छोड़ दें और फिर उम्मीद करें कि सबने उसे पढ़ लिया होगा और हमेशा याद रखेंगे।
क्या ऐसा होता है? बिलकुल नहीं!
आंकड़े क्या कहते हैं, कितनी कंपनियां सीख रही हैं?
हाल ही में एक रिसर्च हुई, जिसमें चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। रिसर्च में शामिल सभी लोगों ने माना कि घटना के बाद सीखने की प्रक्रिया में सुधार की सख़्त ज़रूरत है।
लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या उनका संगठन इन घटनाओं को एक structured improvement cycle में बदल पाता है, तो सिर्फ़ 48% लोगों ने 'हाँ' कहा। जी हाँ, सिर्फ़ 48%! यानी आधे से ज़्यादा संगठन अभी भी इस मामले में पीछे हैं।
इसका सीधा मतलब ये है कि ज़्यादातर संगठन इस बड़े रिस्क पर जी रहे हैं कि उनका कोई भी ग़लत तरीके से हैंडल किया गया इवेंट एक बार फिर से एक गंभीर घटना में बदल सकता है। और तब क्या होगा? क्या फिर से वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी? क्या फिर से बस 'चाय पर चर्चा' करके बात ख़त्म कर दी जाएगी?
एक बड़ी घटना सिर्फ़ टेक्निकल खराबी क्यों नहीं होती?
अब आप कहेंगे, ठीक है, सीखना ज़रूरी है, लेकिन इतना क्या है? तो बात ये है कि कोई भी बड़ी घटना सिर्फ़ टेक्निकल खराबी या सिस्टम का बिगड़ जाना नहीं होती। ये दरअसल बिज़नेस इवेंट होते हैं, जिनके सीधे-सीधे वित्तीय और रेपुटेशनल नतीजे होते हैं।
मतलब, अगर आपका सिस्टम डाउन हुआ, तो ग्राहक को नुक़सान हुआ, आपकी कमाई पर असर पड़ा, और मार्केट में आपकी छवि भी धूमिल हुई।
इसीलिए, जितनी तेज़ी से आप किसी घटना से उबरते हैं, और उससे सीखते हैं, उतना ही ज़्यादा आपको बाज़ार में कंपीटिटिव एडवान्टेज मिलता है। जो कंपनियां हादसों से ज़्यादा बेहतर और तेज़ तरीके से सीखती हैं, वो न सिर्फ़ भविष्य के लिए तैयार रहती हैं, बल्कि ग्राहकों का भरोसा भी जीत पाती हैं।
सोचिए, एक कंपनी जिसने एक बड़ी चूक से सबक लिया और उसे ठीक कर लिया, वो दूसरी कंपनी से कितनी अलग दिखेगी जिसने सिर्फ़ लीपापोती की हो?
'लोक कथाओं' को छोड़कर अब नीति बनाने का वक़्त आ गया है?
तो सीधी बात ये है कि घटना के बाद की समीक्षा (post-incident review) को अब सिर्फ़ एक 'वैकल्पिक टीम आदत' नहीं रहने देना चाहिए, जो इत्तेफ़ाक़ से फैल जाए। इसे एक निश्चित आपरेशनल पालिसी बनाना ही होगा।
और ये पालिसी एक ऐसे माहौल में तैयार होनी चाहिए, जहाँ किसी पर दोषारोपण न किया जाए (no-blame culture)। इसका सीधा संबंध बिज़नेस के नतीजों से होना चाहिए।
यानी, अगर कोई घटना हुई, तो उसकी समीक्षा सिस्टेमैटिक तरीके से हो। ऐसा नहीं कि जिसने मन चाहा, उसने अपनी राय दे दी।
एक ढांचा होना चाहिए, एक प्रक्रिया होनी चाहिए। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य किसी को ज़िम्मेदार ठहराना नहीं, बल्कि सिस्टम में कहाँ कमी रह गई, उसे समझना और उसे ठीक करना होना चाहिए।
तभी तो असल सुधार होगा, वरना तो वही ढाक के तीन पात रहेंगे।
एक शानदार पोस्ट-इंसिडेंट रिव्यू कैसा दिखना चाहिए?
सबसे मज़बूत पोस्ट-इंसिडेंट रिव्यू सिर्फ़ ये डॉक्यूमेंट नहीं करते कि क्या गलत हुआ। बल्कि, ये एक साझा ब्योरा तैयार करते हैं कि क्या हुआ था, क्या फ़ैसले लिए गए, किन संकेतों को नज़रअंदाज़ किया गया, दबाव में कौन सी चीज़ें ठीक से काम कर गईं, और क्या बदलने की ज़रूरत है।
इस पूरी प्रक्रिया का असली मोल एक सुसंगत कहानी (coherent narrative) बनाने में है। और हाँ, रिव्यू को हमेशा दोषारोपण से मुक्त रखना चाहिए।
ताकि टीमें ये समझ सकें कि विफलता कैसे हुई, न कि इसे किसी एक व्यक्ति की गलती तक सीमित कर दें। अगर हम सिर्फ़ व्यक्ति को दोषी ठहराते रहेंगे, तो कभी भी असली समस्या की जड़ तक नहीं पहुँच पाएंगे।
असली चुनौती सिस्टम को समझना और उसे बेहतर बनाना है, न कि किसी पर उंगली उठाना। तभी तो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा और कंपनी और ज़्यादा दमदार बनेगी।



































