दिल्ली: मिडिल ईस्ट से इस वक्त जो खबर आ रही है, वो किसी भी मायने में मामूली नहीं है। अमेरिका और ईरान, ये दो नाम लंबे समय से एक-दूसरे के आमने-सामने रहे हैं, लेकिन अब लग रहा है कि बात सिर्फ बयानबाजी से आगे निकलकर सीधे मैदान-ए-जंग तक पहुंच गई है। तनाव इतना बढ़ चुका है कि मिसाइलों और ड्रोनों की बरसात शुरू हो गई है। जी हां, दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हमला करने का दावा किया है, और इससे इलाके में जबरदस्त हलचल मच गई है।
खबर बताती है कि पहले अमेरिका ने ईरान के अंदर घुसकर 80 से ज्यादा ठिकानों पर बमबारी की। ये हमला इतना तगड़ा था कि ईरान के कई अहम ठिकाने तबाह होने का दावा किया जा रहा है।
अब आप सोच रहे होंगे कि क्या ईरान चुप बैठेगा? बिल्कुल नहीं! ईरानी तेवर तो दुनिया जानती है, और उन्होंने भी फौरन अपना 'करारा और विनाशकारी जवाब' दे दिया। ईरान की तरफ से दावा किया गया है कि उसने बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर 85 मिसाइलें और ड्रोन दाग दिए हैं।
आखिर ये सब शुरू क्यों हुआ?
अब सवाल ये उठता है कि ये आग अचानक क्यों भड़की? अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने एक दावा किया, जिसने इस पूरे बवाल की नींव रखी। उनके मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक) से गुजर रहे तीन कमर्शियल जहाजों पर ईरान ने कथित तौर पर हमले किए थे।
हालांकि, ईरान ने इन हमलों को न तो कबूला और न ही सिरे से खारिज किया। इस आरोप के बाद ही अमेरिकी सेना ने अपनी कमर कसी और ईरान के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान छेड़ दिया।
अमेरिकी सेना के इस अभियान को मंगलवार को अंजाम दिया गया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बकायदा एक बयान जारी कर बताया कि अमेरिकी वायुसेना और नौसेना ने मिलकर ईरान के अंदर 80 से भी ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया।
इन हमलों का मकसद क्या था? अमेरिका का कहना था कि ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, उनके कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क, तटीय रडार साइट्स और एंटी-शिप मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करना। साफ शब्दों में कहें तो, अमेरिका ने ईरान की ताकत को तोड़ने की कोशिश की।
सिर्फ इतना ही नहीं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षा यकीनी बनाने के लिए अमेरिकी सेना ने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की 60 से ज्यादा छोटी नावों को भी टारगेट किया। उनका मकसद था कि ईरान की हमला करने की क्षमता को काफी हद तक कम किया जा सके।
अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि इन नावों का इस्तेमाल समुद्री हमलों के लिए किया जा सकता है।
अमेरिका के हमलों में क्या-क्या हुआ? ईरान का क्या कहना है?
ईरानी सरकारी मीडिया की रिपोर्ट्स की मानें तो, अमेरिकी बमबारी के चलते ईरान के कई अहम इलाकों में भीषण विस्फोट हुए। इनमें बंदर अब्बास, सिरीक पोर्ट, केश्म द्वीप और खर्ग द्वीप जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाके शामिल थे।
ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने सिर्फ सैन्य ठिकानों को ही नहीं, बल्कि नागरिक क्षेत्रों को भी निशाना बनाया। उनके मुताबिक, सिरीक कमर्शियल पियर पर हुए हमले में कई आम लोग भी घायल हुए हैं।
ये आरोप-प्रत्यारोप युद्ध के मैदान में अक्सर देखने को मिलते हैं, जहां हर देश अपने नुकसान को कम और दुश्मन के नुकसान को ज्यादा बताने की कोशिश करता है।
ईरान के इस दावे ने पूरे मामले को और भी गंभीर बना दिया। अगर ये सच है कि नागरिक क्षेत्रों को भी टारगेट किया गया, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका को आलोचना झेलनी पड़ सकती है।
हालांकि, अमेरिका ने अभी तक इन आरोपों पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की है।
ईरान ने कैसे दिया जवाबी हमला?
अमेरिकी हमले के बाद ईरान की प्रतिक्रिया तुरंत और तीखी थी। ईरान के खातम-अल-अंबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर ने अमेरिकी कार्रवाई को 'खुला आक्रमण' करार दिया और खुलेआम युद्ध की चेतावनी दे डाली।
अब जब बात युद्ध तक पहुंच गई, तो ईरान ने भी अपनी तरफ से मोर्चा खोल दिया। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की नौसेना और एयरोस्पेस बलों ने एक बड़ा संयुक्त ऑपरेशन चलाया।
इस ऑपरेशन में ईरान ने बहरीन और कुवैत में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। उन्होंने दावा किया कि कुल 85 मिसाइलें और ड्रोन दाग कर अमेरिकी ठिकानों पर भीषण हमला किया गया।
ये एक बड़ा पलटवार था, जिसने मिडिल ईस्ट में तनाव को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया। ईरान ने खास तौर पर बहरीन में मौजूद अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के मुख्यालय को टारगेट करने का दावा किया।
पांचवां बेड़ा अमेरिकी नौसेना का एक अहम हिस्सा है जो इस क्षेत्र में उसकी मौजूदगी और ऑपरेशन का केंद्र है।
इसके अलावा, कुवैत में स्थित अली अल-सालेम एयर बेस पर भी भारी बमबारी की खबर है। ये एयर बेस भी अमेरिकी सेना के लिए काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां से अमेरिका अपने हवाई ऑपरेशंस को अंजाम देता है।
ईरान का यह कदम साफ दिखाता है कि वह अमेरिकी हमले को हल्के में लेने वाला नहीं है और हर कीमत पर पलटवार करने को तैयार है।
कुल मिलाकर, इस पूरे घटनाक्रम ने मिडिल ईस्ट में एक नए और गंभीर सैन्य टकराव का बिगुल बजा दिया है। दोनों महाशक्तियां आमने-सामने खड़ी हैं और फिलहाल कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा।
दुनिया भर की निगाहें इस इलाके पर टिकी हैं कि क्या यह तनाव और बढ़ेगा या फिर कोई राजनयिक रास्ता निकलेगा। लेकिन मौजूदा हालात तो यही बता रहे हैं कि ये सिर्फ शुरुआत है और आगे क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि कैसे एक छोटे से जहाज हमले के आरोप ने पूरे क्षेत्र को युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि इस स्थिति को और बिगड़ने से कैसे रोका जाए।
फिलहाल, दोनों पक्षों की तरफ से और हमलों की आशंका बनी हुई है, जिससे पूरे मिडिल ईस्ट की शांति दांव पर है।



































