जौनपुर: ज़रा सोचिए, कोई बुज़ुर्ग, जिसका शरीर बीमारियों से कमज़ोर हो चुका है, या कोई गर्भवती महिला जिसे अब चलने-फिरने में भी दिक्कत हो रही है, या फिर कोई ऐसा मरीज़ जो किसी गंभीर बीमारी या चोट से जूझ रहा है और उसे तेज़ी से इलाज की ज़रूरत है, उसे अस्पताल की दूसरी-तीसरी मंज़िल तक जाना हो और लिफ़्ट ख़राब पड़ी हो. कैसा महसूस होगा? ये कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं, बल्कि जौनपुर के उमानाथ सिंह ज़िला अस्पताल की कड़वी हकीकत है, जहां पिछले क़रीब एक महीने से लिफ़्ट बंद पड़ी है.
ज़िला अस्पताल, जो कि आम लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा का एक बड़ा सहारा होता है, वहां ऐसी बुनियादी सुविधा का न होना, हज़ारों लोगों की मुसीबत बन गया है. मरीज़ों और उनके तीमारदारों को रोज़ाना भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
उन्हें अस्पताल की ऊपरी मंज़िलों पर बने ओपीडी, वार्ड और दूसरे ज़रूरी विभागों तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का सहारा लेना पड़ रहा है. और ये कोई आसान काम नहीं, ख़ासकर उन लोगों के लिए जो पहले से ही शारीरिक पीड़ा में हैं.
इस पूरे मामले पर जब अस्पताल प्रशासन से बात की गई, तो उनका कहना है कि लिफ़्ट का संचालन 'लो वोल्टेज' की समस्या की वजह से प्रभावित हुआ है. यानी, बिजली का वोल्टेज कम होने के कारण लिफ़्ट चल नहीं पा रही है.
ये जवाब उन मरीज़ों और उनके परिजनों के गले नहीं उतर रहा है, जो रोज़ अपनी आँखों के सामने अपनों को सीढ़ियां चढ़ते हुए देखते हैं. उनका सवाल सीधा और सरल है – इतनी अहम सुविधा को ठीक करने के लिए तुरंत कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?
लिफ़्ट क्यों बंद हुई? अस्पताल प्रशासन का जवाब
अस्पताल प्रशासन के इस जवाब में एक तरह से लाचारी और लापरवाही दोनों दिख रही है. क्या एक ज़िला अस्पताल में लो वोल्टेज की समस्या को ठीक करने का कोई परमानेंट समाधान नहीं है? क्या ये समस्या आज ही आई है? या पिछले एक महीने से इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया? ये वो सवाल हैं, जो अस्पताल के हर कोने में बैठे मरीज़ और उनके परिजन आपस में एक-दूसरे से पूछ रहे हैं.
लो वोल्टेज की समस्या एक दिन, दो दिन या ज़्यादा से ज़्यादा एक हफ़्ते तक चल सकती है, लेकिन एक महीने तक लिफ़्ट का बंद रहना महज़ लो वोल्टेज का बहाना नहीं लगता, बल्कि ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने जैसा लगता है.
ग़ौरतलब है कि अस्पताल की पहली और दूसरी मंज़िल पर ही ओपीडी, वार्ड और तमाम वो ज़रूरी विभाग हैं, जहाँ हर रोज़ बड़ी संख्या में मरीज़ इलाज के लिए आते हैं. हार्ट के मरीज़ हों, या हड्डी के, पेट की समस्या से जूझ रहे हों या सांस की दिक्कत वाले, सबको ऊपर जाना ही होता है.
ज़िला अस्पताल की ओपीडी में हर दिन क़रीब 900 से 1200 मरीज़ अपना इलाज कराने आते हैं. आप सोचिए, इतने बड़े आँकड़े के साथ इतनी बड़ी दिक्कत कितने लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित कर रही होगी.
साल 1998 में बना अस्पताल और अब लिफ़्ट का हाल
जौनपुर का उमानाथ सिंह ज़िला चिकित्सालय साल 1998 में बना था. उस समय यह एक आधुनिक अस्पताल था, जिसमें दूरगामी सोच के साथ गंभीर मरीज़ों की सुविधा के लिए कई साल पहले ही लिफ़्ट लगाई गई थी.
इसका मक़सद था कि मरीज़ों को वार्ड या ऑपरेशन थिएटर तक आसानी से पहुँचाया जा सके, ताकि उनकी तकलीफ़ कम हो और इलाज समय पर मिल सके. लेकिन आज वही लिफ़्ट बंद पड़ी है और यह सुविधा बेअसर साबित हो रही है.
अस्पताल में आने वाले लोगों को याद है वो दिन जब यह लिफ्ट ठीक से काम करती थी और कैसे इसने हज़ारों मरीज़ों की जान बचाई होगी या उनकी पीड़ा को कम किया होगा. आज वही लिफ़्ट इतिहास बनकर खड़ी है, किसी काम की नहीं.
गोद में उठाकर मरीज़ ले जाते तीमारदार; देखिए ये तस्वीरें
लिफ़्ट बंद होने का सीधा असर उन तीमारदारों पर पड़ रहा है, जो अपने बीमार परिजन को लेकर अस्पताल आते हैं. आए दिन ऐसी तस्वीरें देखने को मिल रही हैं, जहाँ तीमारदार अपने मरीज़ों को गोद में उठाकर या कंधे पर लादकर सीढ़ियों से ऊपर-नीचे ले जा रहे हैं.
किसी का पैर टूटा है, तो किसी को ऑपरेशन के बाद आराम की सख़्त ज़रूरत है, लेकिन मजबूरी इतनी है कि सीढ़ियां चढ़ने के अलावा कोई और चारा नहीं. ऐसे में मरीज़ की हालत और बिगड़ने का डर बना रहता है.
कई बार तो मरीज़ों को स्ट्रेचर पर भी लोग खींचते हुए सीढ़ियों से ले जाते हुए दिखे हैं, जो कि किसी भी तरीक़े से सुरक्षित नहीं है और स्वास्थ्य सुविधाओं पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है.
ये न सिर्फ़ शारीरिक परेशानी है, बल्कि मानसिक तौर पर भी ये तीमारदारों और मरीज़ों को तोड़ रही है. सोचिए, एक व्यक्ति जो पहले से ही बीमारी से लड़ रहा है, उसे इलाज से पहले इतनी शारीरिक मशक़्क़त करनी पड़ रही है.
ये उसके ठीक होने की प्रक्रिया पर भी बुरा असर डाल सकता है.
जिम्मेदारों से सवाल, कब तक मिलेगी राहत?
मरीज़ों और उनके तीमारदारों ने अस्पताल प्रशासन से साफ़ शब्दों में मांग की है कि जल्द से जल्द लिफ़्ट को चालू कराया जाए. उनकी अपील है कि इस समस्या पर ग़ौर किया जाए और इसे महज़ 'लो वोल्टेज' का बहाना बताकर टालने की कोशिश न की जाए.
ज़िला अस्पताल हर आम और ख़ास के लिए होता है. यहाँ दूर-दराज़ के गाँव से लोग उम्मीद लेकर आते हैं.
ऐसे में अगर अस्पताल की बुनियादी सुविधा ही नदारद हो, तो उनकी उम्मीदें टूटना लाज़मी है.
यह सिर्फ़ एक लिफ़्ट की बात नहीं है, यह बात है उन हज़ारों लोगों के स्वास्थ्य और उनकी सुविधा की, जो सरकार पर भरोसा करके इलाज के लिए आते हैं. उम्मीद है कि प्रशासन इस गंभीर समस्या पर जल्द से जल्द ध्यान देगा और जौनपुर के उमानाथ सिंह ज़िला अस्पताल की लिफ़्ट फिर से चालू होगी, ताकि मरीज़ों को राहत मिल सके और गंभीर मामलों में इलाज में देरी का ख़तरा टल सके.

