मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में एक ऐसा वार्ड भी है, जहां के लोग अपने ही घर को ‘कूड़ा डंपिंग ग्राउंड’ कहने लगे हैं। बात हो रही है वार्ड-19 दायमपुर की, जो शहर के बॉर्डर पर बसा है। यहां की हालत ऐसी है कि चुनाव के दौरान जो वादे किए गए थे, वो वादे ही रह गए और अब तो लोगों को मूलभूत सुविधाएं भी नसीब नहीं हो रही हैं। जर्जर सड़कें, कचरे से अटी नालियां और हर तरफ गंदगी का आलम, ये है इस वार्ड की मौजूदा तस्वीर।
रोजमर्रा की ज़िंदगी में बिजली-पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी यहां के लोगों के लिए संघर्ष का दूसरा नाम बन गई हैं। दैनिक भास्कर की 'वार्ड परिक्रमा' नाम की मुहिम में जब हमारी टीम दायमपुर पहुंची, तो लोगों ने दिल खोलकर अपनी परेशानियां बताईं।
उनका कहना था कि शिकायतें तो सालों से हो रही हैं, लेकिन न तो अफसर सुनते हैं और न ही जनप्रतिनिधि। बस आश्वासन पर आश्वासन मिलते रहते हैं, लेकिन ज़मीन पर कोई बदलाव नहीं दिखता।
कूड़े का पहाड़ और बीमारियों का डर: वार्ड-19 की कहानी
सोचिए, आपके वार्ड में आसपास के वार्डों का कचरा लाकर डाल दिया जाए, तो आपको कैसा लगेगा? दायमपुर के लोगों को इसी त्रासदी से हर दिन जूझना पड़ रहा है। वार्ड में जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हैं।
नालियां जाम पड़ी हैं और उनमें कूड़ा-करकट भरा हुआ है। आलम ये है कि नालियों के बाहर घास उग आई है, जो चीख-चीखकर बता रही है कि इनकी सफाई कब से नहीं हुई।
इस गंदगी की वजह से मच्छरों का प्रकोप इतना बढ़ गया है कि संक्रामक बीमारियों का खतरा हर वक्त मंडराता रहता है। लोगों का जीवन दूभर हो गया है और वे बीमारी के डर में जी रहे हैं।
जर्जर सड़कें और जलभराव: राह चलना भी मुश्किल
वार्ड की सड़कों का हाल तो और भी बुरा है। ज़्यादातर सड़कें पूरी तरह से टूट चुकी हैं और उनमें गहरे-गहरे गड्ढे बन गए हैं।
थोड़ी सी बारिश होते ही इन गड्ढों में गंदा पानी भर जाता है। कई गलियां तो मुख्य सड़क से भी नीचे हैं, जिससे बारिश का पानी उनमें ठहर जाता है।
इन सड़कों पर पैदल चलना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। आए दिन लोग फिसलकर घायल हो जाते हैं।
बारिश के दिनों में तो स्कूल जाने वाले बच्चों और महिलाओं को भारी दिक्कत होती है। लोगों को लगता है कि वे सड़क पर नहीं, बल्कि किसी दलदल में चल रहे हैं।
निगम की जमीन पर अतिक्रमण: किसकी जिम्मेदारी?
सिर्फ सड़कें और नालियां ही नहीं, वार्ड-19 में निगम की ज़मीन पर भी दबंगों ने कब्जा कर लिया है। लोगों का कहना है कि इन अतिक्रमणकारियों की वजह से भी इलाके में गंदगी और बदबू का साम्राज्य बना रहता है।
जहां खेल के मैदान या सार्वजनिक सुविधाएं होनी चाहिए, वहां अवैध कब्जे और कूड़ा-करकट पसरा हुआ है। यह सवाल उठता है कि जब सरकारी ज़मीन पर ही अतिक्रमण हो जाए, तो आम आदमी अपनी समस्याओं के लिए कहां जाए?
श्मशान घाट और मंदिर की बदहाली: धार्मिक स्थानों का हाल
लखवाया क्षेत्र में स्थित श्मशान घाट की हालत इतनी जर्जर है कि लोग वहां जाने से भी कतराते हैं। भवन कभी भी गिर सकता है और आसपास गंदगी व जलभराव इतना ज़्यादा है कि अंतिम संस्कार के दौरान भी लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है।
वहीं, गांव के मंदिर के बाहर भी नियमित सफाई नहीं होती है। चारों ओर कीचड़ फैला रहता है, जिससे श्रद्धालुओं, खासकर महिलाओं और बच्चों को मंदिर आने-जाने में दिक्कत होती है।
धार्मिक आस्था के केंद्र भी यहां बदहाली की मार झेल रहे हैं।
बाज़ार में शौचालय नहीं, बच्चों के लिए पार्क भी गायब
वार्ड के लखवाया बाज़ार में रोज़ाना बड़ी संख्या में लोग खरीदारी करने आते हैं। लेकिन ताज्जुब की बात है कि यहां एक भी सार्वजनिक शौचालय की सुविधा नहीं है।
व्यापारियों और ग्राहकों को खासकर महिलाओं को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई बार मांग उठाई गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
बात बच्चों की करें, तो वार्ड में उनके खेलने के लिए न तो कोई पार्क है और न ही कोई खेल मैदान। स्कूल का मैदान भी बारिश के दिनों में पानी से भर जाता है, जिससे बच्चे खेल नहीं पाते।
एक तरफ शहर तरक्की के दावे करता है और दूसरी तरफ यहां बच्चों के बचपन को खेलने की जगह तक नसीब नहीं है। यह उन चुनावी वादों की पोल खोलता है, जो हर चुनाव में किए जाते हैं, लेकिन फिर भुला दिए जाते हैं।
वार्ड-19 के लोग अब बस इतना चाहते हैं कि उनके जीवन में बुनियादी सुविधाएं लौट आएं और उन्हें एक सम्मानजनक माहौल मिल सके।

