मेरठ: पश्चिम उत्तर प्रदेश की सियासी बिसात पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने एक बड़ा दांव चला है। पार्टी ने अपने पुराने धुरंधर और गुर्जर समुदाय के कद्दावर नेता सतवीर सिंह नागर की घर वापसी करा दी है। इतना ही नहीं, उनकी वापसी सिर्फ स्वागत समारोह तक सीमित नहीं रही, बल्कि तुरंत उन्हें मेरठ मंडल का प्रभारी जैसा अहम पद देकर संगठन में उनकी जगह पक्की कर दी गई है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब बसपा उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन तलाशने में जुटी है, खासकर पश्चिमी इलाके में जहां जाट, गुर्जर और अन्य ओबीसी समुदाय के वोट बैंक काफी अहम माने जाते हैं।
सतवीर सिंह नागर का नाम पश्चिम यूपी की राजनीति में कोई नया नहीं है। उन्हें ओबीसी वर्ग में गुर्जर बिरादरी का मजबूत चेहरा माना जाता है।
उनकी सियासी पकड़ और संगठन क्षमता को बसपा हमेशा से जानती रही है। यही वजह है कि उनकी वापसी को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह हलचल तेज हो गई है।
बसपा कार्यकर्ताओं में उत्साह दिख रहा है और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले चुनावों में इसका सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। लेकिन सवाल ये भी है कि आखिर इतने बड़े बदलाव के पीछे बसपा की क्या रणनीति है?
सतवीर नागर का लंबा सियासी सफर
सतवीर सिंह नागर का राजनीतिक करियर बसपा के साथ गहरा जुड़ा रहा है। वो सिर्फ किसी चुनाव में किस्मत आजमाने वाले नेता नहीं रहे, बल्कि विधानसभा में दो बार अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।
साल 2007 और फिर 2012 में, जब यूपी की राजनीति में बसपा का दबदबा था, तब सतवीर सिंह नागर ने दादरी विधानसभा सीट से हाथी के निशान पर चुनाव लड़ा और विधायक चुने गए। यह उनके जनाधार और बसपा के साथ उनके मजबूत रिश्ते का प्रमाण था।
दादरी, गौतम बुद्ध नगर जिले में स्थित है और यहां गुर्जर समुदाय की अच्छी खासी आबादी है, जो नागर के लिए हमेशा एक मजबूत आधार रही है।
सिर्फ विधानसभा तक ही नहीं, सतवीर नागर ने लोकसभा चुनाव में भी बसपा के लिए मोर्चा संभाला है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें गौतम बुद्ध नगर संसदीय सीट से उम्मीदवार बनाया था।
भले ही उस चुनाव में उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन यह बसपा के उन पर भरोसे को दर्शाता है कि पार्टी ने उन्हें एक महत्वपूर्ण सीट से मैदान में उतारा। यह दिखाता है कि पार्टी उन्हें सिर्फ एक क्षेत्रीय नेता नहीं, बल्कि बड़े मंच पर भी प्रतिनिधित्व करने में सक्षम मानती थी।
उनका यह अनुभव और राजनीतिक समझ अब बसपा के लिए फिर से काम आने वाली है।
मेरठ मंडल का प्रभार; क्यों है यह अहम?
सतवीर सिंह नागर को पार्टी में वापस लाने के बाद उन्हें मेरठ मंडल का प्रभारी बनाया गया है। अब आप सोच रहे होंगे कि यह मेरठ मंडल का प्रभारी पद क्या बला है और इतना अहम क्यों है? दरअसल, उत्तर प्रदेश में मंडल स्तर पर प्रभारियों की नियुक्ति बसपा की संगठन संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मंडल प्रभारी का काम अपने क्षेत्र के जिलों में पार्टी संगठन को मजबूत करना, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और स्थानीय मुद्दों पर पार्टी की आवाज़ बुलंद करना होता है। एक तरह से वे अपने मंडल में पार्टी के सर्वेसर्वा होते हैं, जो सीधे पार्टी आलाकमान को रिपोर्ट करते हैं।
मेरठ मंडल पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें मेरठ, बागपत, बुलंदशहर, गौतम बुद्ध नगर, गाज़ियाबाद और हापुड़ जैसे जिले शामिल हैं।
इन जिलों में गुर्जर, जाट, दलित, मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग की बड़ी आबादी रहती है। चुनावी दृष्टि से यह मंडल हमेशा से ही बहुत संवेदनशील और महत्वपूर्ण रहा है।
ऐसे में सतवीर सिंह नागर जैसे अनुभवी और जातीय समीकरणों को समझने वाले नेता को इस मंडल का प्रभार देना बसपा की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मालूम होता है। पार्टी को उम्मीद है कि नागर अपने अनुभव और समुदाय में अपनी पैठ का इस्तेमाल कर बसपा को यहां फिर से खड़ा कर पाएंगे।
पश्चिम यूपी में बसपा की नई उम्मीदें
बसपा की ओर से सतवीर सिंह नागर की यह वापसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक मजबूती के तौर पर देखी जा रही है। पिछले कुछ चुनावों में बसपा का प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया है।
विशेषकर पश्चिमी यूपी के क्षेत्रों में, जहां कभी बसपा का एकछत्र राज हुआ करता था, वहां अब दूसरी पार्टियों ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। ऐसे में नागर जैसे नेता की वापसी, जो न केवल गुर्जर समुदाय से आते हैं बल्कि एक जमीनी स्तर के कार्यकर्ता और विधायक भी रहे हैं, बसपा के लिए संजीवनी का काम कर सकती है।
पार्टी कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का खुले दिल से स्वागत किया है। उनका मानना है कि आगामी चुनावों के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम है।
खासकर लोकसभा चुनाव 2024 और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर, बसपा की यह रणनीति ओबीसी वोटों को साधने और अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक के साथ अन्य समुदायों को जोड़ने की कोशिश लगती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सतवीर सिंह नागर अपनी नई जिम्मेदारी को कैसे निभाते हैं और बसपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कितना मजबूत कर पाते हैं।

