नालंदा: सोचिए, आपका बच्चा स्कूल में पढ़ रहा है और उसका सारा पढ़ाई-लिखाई का रिकॉर्ड एक जगह डिजिटल रूप में सुरक्षित हो। न स्कूल बदलने पर कागज़ात का झंझट, न स्कॉलरशिप के लिए भागादौड़ी। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय इसी सपने को हकीकत बनाने के लिए एक बड़ी मुहिम चला रहा है, जिसका नाम है ‘वन नेशन वन स्टूडेंट’। इसके तहत हर बच्चे को एक खास पहचान मिलेगी – AAPAR ID। लेकिन बिहार के नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड में ये सपना अभी अधूरा सा दिख रहा है। यहां हज़ारों बच्चों के भविष्य का यह डिजिटल गेट-पास अभी तक नहीं बन पाया है, और अब प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ) ने कमर कस ली है। फरमान साफ है: एक हफ़्ते में काम पूरा चाहिए, नहीं तो खैर नहीं!
मामला कुछ यूं है कि हरनौत प्रखंड संसाधन केंद्र में हाल ही में शिक्षकों के साथ एक बड़ी बैठक हुई। इस बैठक का एजेंडा था AAPAR ID (ऑटोमेटिक परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री) कार्ड बनाने की रफ्तार बढ़ाना।
प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी, नितेश कुमार रंजन, ने इस दौरान सबको साफ-साफ बता दिया कि लापरवाही किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो काम अभी तक लटका हुआ है, उसे अगले सात दिनों के भीतर शत-प्रतिशत पूरा करना है।
AAPAR ID की यह पूरी कवायद केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'वन नेशन वन स्टूडेंट' योजना का ही एक अहम हिस्सा है। इस योजना के तहत देश के हर छात्र-छात्रा की एक अद्वितीय डिजिटल आईडी बनाई जा रही है।
इस आईडी में बच्चे के नाम के साथ-साथ उसकी जन्मतिथि, लिंग, पता, माता-पिता का नाम, और सबसे महत्वपूर्ण, उसकी पूरी शैक्षणिक यात्रा का विवरण दर्ज होगा। एक तरह से यह बच्चों की पढ़ाई का पूरा बायोडाटा होगा, जो एक क्लिक पर उपलब्ध हो सकेगा।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बच्चे के किसी भी स्कूल में दाखिले से लेकर, परीक्षा के अंकों और अन्य गतिविधियों तक की सारी जानकारी एक ही जगह पर सुरक्षित रहेगी। इससे छात्रों को एक स्कूल से दूसरे स्कूल में जाने, स्कॉलरशिप आवेदन करने या किसी भी शैक्षणिक संस्थान में दस्तावेज़ जमा करने में काफी सहूलियत मिलेगी।
कागज़ी कार्यवाही का बोझ कम होगा और पूरा सिस्टम ज़्यादा पारदर्शी और कुशल बनेगा।
हरनौत में आंकड़े और अधूरी तस्वीर
हरनौत प्रखंड की बात करें तो, यहां कुल 175 स्कूल संचालित होते हैं। इनमें 77 प्राथमिक विद्यालय, 47 मध्य विद्यालय, 18 हाई स्कूल और 33 निजी विद्यालय शामिल हैं।
इन सभी स्कूलों में कुल मिलाकर 29,829 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं। इन बच्चों में से अब तक 17,392 छात्र-छात्राओं के AAPAR ID कार्ड जनरेट किए जा चुके हैं, जो कि एक अच्छी संख्या है।
हालांकि, असल चुनौती उन बाकी बच्चों को लेकर है, जिनके कार्ड अभी नहीं बने हैं। आंकड़ों के हिसाब से करीब 42% छात्र-छात्राएं, यानी लगभग 12,500 बच्चों के AAPAR ID कार्ड अभी भी बनने बाकी हैं।
यह संख्या अपने आप में बड़ी है और यही वजह है कि बीईओ नितेश कुमार रंजन ने इस काम को अब 'मिशन मोड' में लेने का फैसला किया है। उन्हें लगता है कि इस काम में तेज़ी लाने की सख़्त ज़रूरत है ताकि सभी बच्चे इस डिजिटल सुविधा का लाभ उठा सकें।
बीईओ का फरमान: एक हफ्ते में 100% काम
बीईओ नितेश कुमार रंजन ने इस कार्य को लेकर ताबड़तोड़ बैठकें कीं। गुरुवार को उन्होंने सभी निजी स्कूल और मध्य विद्यालयों के प्रभारी/निदेशकों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की।
इसके अगले ही दिन, शुक्रवार को, उन्होंने प्राथमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों के प्रभारी प्रधानाध्यापकों के साथ भी गहन बातचीत की। इन बैठकों का मुख्य मक़सद यही था कि AAPAR ID कार्ड के निर्माण में जो देरी हो रही है, उसे जल्द से जल्द ख़त्म किया जाए।
उन्होंने साफ़ निर्देश दिए हैं कि AAPAR कार्ड नहीं बनाने वाले सभी प्रभारियों को एक सप्ताह के भीतर 100% आधार सत्यापन सुनिश्चित करते हुए सभी बच्चों के AAPAR ID कार्ड बनाने होंगे। बीईओ ने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा, “शत-प्रतिशत बच्चों की AAPAR ID अनिवार्य है और इस काम में किसी भी स्तर पर कोई ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
” उन्होंने यह भी बताया कि AAPAR कार्ड बनाने के लिए बच्चे का आधार कार्ड और उसके माता या पिता में से किसी एक का आधार कार्ड होना ज़रूरी है। इसका मतलब है कि स्कूलों को न केवल बच्चों के डेटा को अपडेट करना होगा, बल्कि अभिभावकों से संपर्क करके ज़रूरी दस्तावेज़ भी एकत्र करने होंगे।
आगे की राह और बच्चों का भविष्य
इस महत्वपूर्ण अभियान को पूरा करने के लिए डाटा एंट्री ऑपरेटर ध्रुव कुमार और आईसीटी मॉनिटर ऋषि कुमार सहित कई अधिकारी और शिक्षक भी मौजूद थे। वे यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर कोई अड़चन न आए।
इस मिशन मोड में किए जा रहे कार्य का उद्देश्य यह है कि हरनौत के एक भी बच्चे को भविष्य में किसी भी शैक्षणिक सुविधा से वंचित न होना पड़े, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके पास उसकी डिजिटल पहचान नहीं है। यह डिजिटल पहचान न केवल बच्चों के शैक्षणिक रिकॉर्ड को व्यवस्थित करेगी, बल्कि शिक्षा प्रणाली को भी आधुनिक और समावेशी बनाने में मदद करेगी।
उम्मीद है कि एक हफ़्ते के भीतर हरनौत के बच्चे भी इस डिजिटल क्रांति का हिस्सा बन पाएंगे और उनका भविष्य और भी उज्जवल होगा।

