पटना: बिहार की सियासी बिसात पर आजकल गजब की गहमागहमी चल रही है। कभी कोई नेता सवालों से तमतमा जाता है, तो कभी कोई मंत्री पीएम मोदी के अंदाज़ में जनता के बीच पहुँच जाता है। ऐसा ही कुछ मंगलवार को देखने को मिला, जब राजधानी पटना में बीजेपी की एक युवा विधायक से एक रिपोर्टर ने ऐसा सवाल पूछ लिया कि मैडम का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। मामला एक स्थानीय विकास परियोजना से जुड़ा था, जिस पर लगातार सवाल उठ रहे थे।
बात कुछ यूँ थी कि सूबे में एक महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना का काम पिछले कई महीनों से अटका पड़ा है। स्थानीय लोग, खास कर किसान, इस पर सवाल उठा रहे थे क्योंकि उनकी जमीनें तो ली गईं, लेकिन मुआवजा और काम दोनों ही ठप्प पड़े थे।
जब मीडिया ने इस मामले में स्थानीय बीजेपी विधायक, सुश्री नेहा सिंह से सवाल किया कि आखिर इतनी देरी क्यों हो रही है और कब तक लोगों को इंसाफ मिलेगा, तो विधायक महोदया पहले तो कुछ टालमटोल करती दिखीं, लेकिन जब सवालों की बौछार तेज हुई तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने मीडिया पर ‘सरकार की छवि खराब करने’ का आरोप लगाया और बिना कोई ठोस जवाब दिए, वहाँ से चलती बनीं।
उनकी नाराजगी इस कदर थी कि उन्होंने पत्रकारों से बातचीत तक करने से मना कर दिया, जिससे विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का एक और मौका मिल गया।
केंद्रीय मंत्री का 'यू-टर्न': महापंचायत पर बदला रुख
एक तरफ जहाँ युवा विधायक के तेवर गर्म थे, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय राजनीति में एक बड़े मंत्री ने एक अहम महापंचायत को लेकर अपना रुख बदल लिया। बात हो रही है केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री गिरिधारी लाल की।
पिछले हफ्ते, उन्होंने किसानों की एक बड़ी महापंचायत में शिरकत करने का ऐलान किया था, जो किसानों की कर्जमाफी और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) को लेकर अपनी माँगें उठाने वाली थी। मंत्री जी के इस कदम को किसानों के हित में एक बड़ा राजनीतिक दाँव माना जा रहा था, लेकिन ऐन वक्त पर उन्होंने इस महापंचायत से दूरी बनाने का फैसला कर लिया।
सूत्रों की मानें तो यह फैसला शीर्ष नेतृत्व के दबाव में लिया गया है। पहले उम्मीद थी कि मंत्री जी खुद महापंचायत में जाकर किसानों से बात करेंगे और उनकी समस्याओं को सुनेंगे।
लेकिन अचानक ही उनके कार्यालय से बयान आया कि व्यस्त कार्यक्रम के चलते वे इस महापंचायत में शामिल नहीं हो पाएँगे। इस 'यू-टर्न' को लेकर राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा है।
विपक्ष का कहना है कि सरकार किसानों की समस्याओं से भाग रही है और उनकी मांगों को अनसुना कर रही है। वहीं, सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मंत्री जी की उपस्थिति से विपक्ष को बेवजह एक मुद्दा बनाने का मौका मिल सकता था, इसलिए फिलहाल एहतियात बरती गई है।
यह भी सुनने में आया कि पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी 'हम' (Hindustani Awam Morcha) इस महापंचायत में किसानों के समर्थन में बड़ा प्रदर्शन करने वाली थी, जिससे राजनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका थी।
गन्ना मंत्री का 'झालामूरी' प्रेम: PM मोदी के रास्ते पर
इधर, जहाँ कुछ नेता सवालों से बचने में लगे थे या अपना रुख बदल रहे थे, वहीं बिहार के गन्ना उद्योग मंत्री, श्री रामेश्वर प्रसाद, एक अलग ही अंदाज में जनता के बीच पहुँचते दिखे। उनका यह अंदाज कहीं न कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'चाय पे चर्चा' या 'जनता के बीच पहुँच' वाले फॉर्मूले की याद दिलाता है।
मंगलवार की शाम, जब पटना की सड़कों पर आम लोगों की भीड़ लगी थी, मंत्री रामेश्वर प्रसाद अचानक एक व्यस्त चौक पर रुके और एक ठेले वाले से गरमा-गरम झालामूरी बनवाने लगे।
यह कोई मामूली बात नहीं थी। मंत्री जी ने खुद झालामूरी वाले से मिर्च-मसाले का हिसाब पूछा, अपने हाथों से नींबू निचोड़ा और फिर बड़े चाव से झालामूरी का स्वाद लिया।
इस दौरान उन्होंने आसपास खड़े लोगों से बातचीत भी की, उनकी समस्याओं को सुना और मुस्कुराते हुए सेल्फी भी खिंचवाई। मंत्री जी का यह 'झालामूरी मोमेंट' तुरंत सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
लोगों ने इसकी तुलना पीएम मोदी के उन पलों से की, जब वे आम जनता के बीच पहुँचकर उनके साथ घुलमिल जाते हैं। जानकारों का मानना है कि यह मंत्री जी की छवि को आम आदमी से जोड़ने की एक सुनियोजित कोशिश है, खासकर ऐसे समय में जब सरकार पर 'जनता से दूरी' बनाने के आरोप लग रहे हैं।
इस कदम से उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे जनता के बीच के ही नेता हैं और उनकी समस्याओं को समझते हैं।
कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति में मंगलवार का दिन कई रंगों से भरा रहा – कहीं गुस्सा, कहीं सियासी 'यू-टर्न', तो कहीं 'झालामूरी' के जरिए जनता से जुड़ने की कोशिश। यह दिखाता है कि बिहार में राजनीतिक सरगर्मियां हमेशा उफान पर रहती हैं और हर दिन कुछ न कुछ नया देखने को मिलता है।

