प्रयागराज: वाराणसी के दालमंडी इलाके के उन दुकानदारों के लिए एक बड़ा झटका लगा है, जो काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के पास सड़क चौड़ीकरण और सुंदरीकरण प्रोजेक्ट को रोकने की उम्मीद लगाए बैठे थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कह दिया है कि अगर जनहित और बुनियादी ढांचे के विकास की बात है, तो सरकार धार्मिक स्थलों का भी अधिग्रहण कर सकती है।
पूरा मामला यह है कि दालमंडी मार्केट के छह दुकानदार, जो वहां किराए पर दुकानें चला रहे थे, उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी मांग थी कि प्रशासन उन्हें बलपूर्वक बेदखल न करे और पुलिस या अर्धसैनिक बलों का इस्तेमाल कर उनका उत्पीड़न न किया जाए।
लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और सरकार के फैसले को सही ठहराया।
इन दुकानदारों की चिंता सिर्फ अपनी रोजी-रोटी तक सीमित नहीं थी। याचिका में क्षेत्र की छह प्राचीन मस्जिदों—अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, मस्जिद रंगीले शाह, मस्जिद अली रज़ा खान, मस्जिद करीमुल्लाह बेग, मस्जिद निसारन और मस्जिद संगमरमर—को ढहाने या उनका स्वरूप बदलने से रोकने की मांग भी की गई थी।
याचियों का कहना था कि दालमंडी एक पुराना और व्यस्त बाजार है और लोक निर्माण विभाग के इस करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट से हजारों लोगों की आजीविका पर असर पड़ेगा।
किरायेदार होने के कारण नहीं मिला मालिकाना हक
कोर्ट की सुनवाई के दौरान एक अहम बात सामने आई। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने पाया कि याचिका दायर करने वाले लोग केवल किराएदार हैं।
उनके पास रेंट एग्रीमेंट या बिजली बिल जैसे दस्तावेज तो हैं, लेकिन मालिकाना हक नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी जगह पर लंबे समय तक व्यापार करने से कोई व्यक्ति उस संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता।
कानूनी तौर पर, भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के मुताबिक, मुआवजे की बात करने या आपत्ति जताने का अधिकार सिर्फ संपत्ति के वास्तविक मालिक का होता है। दिलचस्प बात यह रही कि जिन असली मालिकों की जमीन अधिग्रहित होनी थी, उन्होंने इस परियोजना पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी।
ऐसे में किराएदारों की याचिका का आधार कमजोर पड़ गया।
धार्मिक स्थलों के अधिग्रहण पर कोर्ट की टिप्पणी
याचिकाकर्ताओं ने 'पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991' का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि मस्जिदों का अधिग्रहण अवैध है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।
कोर्ट ने समझाया कि 1991 के अधिनियम का मकसद किसी पूजा स्थल को एक धर्म से दूसरे धर्म में बदलने से रोकना है, न कि सरकार के विकास कार्यों को रोकना।
कोर्ट ने कहा कि यह कानून सड़क चौड़ीकरण या बुनियादी ढांचे के विकास जैसे धर्मनिरपेक्ष और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए किए जाने वाले वैध अधिग्रहण के खिलाफ कोई 'सुरक्षा कवच' या ढाल नहीं है। यानी, जनहित में सरकार किसी भी धार्मिक स्थल का अधिग्रहण कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला
अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के 1994 के एक ऐतिहासिक फैसले (डॉ एम इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ) का जिक्र किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मस्जिद सहित कोई भी अचल संपत्ति राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहित की जा सकती है।
मस्जिद को अन्य धर्मों के पूजा स्थलों की तुलना में कोई विशेष संवैधानिक छूट नहीं मिली हुई है।
इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि संशोधित वक्फ अधिनियम की धारा 51 और 91 के तहत, वक्फ बोर्ड की सलाह से भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के जरिए संपत्तियों का अधिग्रहण संभव है। मामले में यह भी देखा गया कि मस्जिदों के प्रबंधन (मुतवल्ली) या वक्फ बोर्ड ने सीधे तौर पर इस अधिग्रहण पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी।

