प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज, जिसे अक्सर अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान के लिए जाना जाता है, अब एक नए अवतार में सामने आई है। अब यहां के खेल के मैदानों से भी ऐसी खबरें आ रही हैं, जो देश का नाम रोशन कर रही हैं। बात हो रही है मेजा के सिंहपुर गांव के एक होनहार एथलीट बजरंग पांडेय की, जिन्होंने हाल ही में छत्तीसगढ़ में आयोजित फेडरेशन कप 2026 में 100 मीटर दौड़ में अपना ही पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया है। ये कोई मामूली बात नहीं है, बल्कि इससे भी बड़ी खबर ये है कि इस शानदार प्रदर्शन के बूते उन्होंने अगस्त में होने वाले प्रतिष्ठित कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए अपनी जगह पक्की कर ली है।
29 मई को स्वामी विवेकानंद एथलेटिक स्टेडियम में जब फेडरेशन कप 2026 का आयोजन हुआ, तो वहां कुल 50 धावकों ने हिस्सा लिया था। लेकिन इस भीड़ में एक नाम ऐसा था, जिसने अपनी रफ्तार से सबको पीछे छोड़ दिया – वो थे बजरंग पांडेय।
उन्होंने सिर्फ अपनी रफ्तार से ट्रैक पर आग नहीं लगाई, बल्कि प्रयागराज जिले का नाम भी गर्व से ऊंचा कर दिया। उनकी इस उपलब्धि ने पूरे देश का ध्यान खींचा है और खेल प्रेमियों में एक नई उम्मीद जगाई है।
बजरंग का कमाल और कॉमनवेल्थ तक का सफर
बजरंग पांडेय का नाम पहली बार सुर्खियों में नहीं आया है। इससे पहले भी उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर अपनी काबिलियत साबित की है।
उनकी रेस की रफ्तार और ट्रैक पर उनका जुनून ही उन्हें दूसरों से अलग बनाता है। बजरंग पहले फ्रांस और पेरिस जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं, जहां उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया।
उनकी हर दौड़ एक कहानी कहती है – कहानी मेहनत की, लगन की और कभी न हार मानने वाले जज्बे की।
फ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान बजरंग ने खुद बताया कि उनका अगला और सबसे बड़ा लक्ष्य विश्व के महानतम धावक उसैन बोल्ट का रिकॉर्ड तोड़ना है। उनका सपना सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि भारत के लिए ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्वर्ण पदक जीतना है।
ये लक्ष्य जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी उनकी तैयारी भी है। दिन-रात की कड़ी मेहनत और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण ही उन्हें इस सपने को पूरा करने की प्रेरणा देता है।
उनके लिए उसैन बोल्ट का रिकॉर्ड तोड़ना सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत को एथलेटिक्स में एक नई पहचान दिलाने का जरिया भी है।
चाय की दुकान से ओलंपिक के सपने तक
बजरंग पांडेय का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। वो एक ऐसे परिवार से आते हैं, जिसकी आर्थिक स्थिति कभी बहुत अच्छी नहीं रही।
उनके माता-पिता, श्रीमती आरती पांडेय और श्री राजेश पांडेय, एक छोटी सी चाय की दुकान चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। सोचिए, एक चाय की दुकान से होने वाली मामूली कमाई में अपने बच्चे के एथलेटिक्स के महंगे खेल को समर्थन देना कितना मुश्किल रहा होगा।
लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों में भी बजरंग ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने गरीबी को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे अपनी ताकत बनाया।
उनके माता-पिता ने भी अपने बेटे के सपनों को पंख देने के लिए हर संभव प्रयास किया।
यह उनके माता-पिता का त्याग और बजरंग का अथक परिश्रम ही था, जिसके दम पर उन्होंने 2022 में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर पूरे देश को चौंका दिया था। उस जीत ने न सिर्फ उनके परिवार के लिए खुशियां लाईं, बल्कि यह संदेश भी दिया कि अगर लगन सच्ची हो, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
आज भी बजरंग और उनकी माताजी का सबसे बड़ा सपना है कि बजरंग उसैन बोल्ट का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ें। यह सपना सिर्फ एक खिलाड़ी का नहीं, बल्कि एक मां का भी है, जिसने अपने बेटे के लिए कई कुर्बानियां दी हैं।
भारतीय सेना में सूबेदार; उसैन बोल्ट है अगला निशाना
बजरंग पांडेय की प्रतिभा को उत्तर प्रदेश सरकार ने भी सराहा और उन्हें सम्मानित किया। उनकी खेल प्रतिभा को देखते हुए उन्हें भारतीय सेवा में सूबेदार के पद पर खेल कोटा के माध्यम से नियुक्ति मिली है।
आज वह भारतीय सेना में कार्यरत हैं और देश सेवा के साथ-साथ अपने खेल को भी आगे बढ़ा रहे हैं। सेना में शामिल होने से उन्हें एक स्थिर करियर और अपने खेल को जारी रखने के लिए बेहतर सुविधाएं मिली हैं।
यह उनके लिए दोहरी गर्व की बात है – एक तरफ देश की सेवा, दूसरी तरफ खेल के मैदान में देश का नाम रोशन करना।
बजरंग पांडेय का मानना है कि अगर क्रिकेट की तरह एथलेटिक्स को भी सरकारी और सामाजिक स्तर पर पर्याप्त समर्थन मिले, तो भारत अमेरिका और चीन जैसे देशों से भी अधिक संख्या में स्वर्ण पदक जीत सकता है। यह सिर्फ उनकी बात नहीं, बल्कि भारत के कई एथलीटों की भावनाओं को भी दर्शाता है।
खेल के क्षेत्र में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, बस उन्हें सही मंच और प्रोत्साहन की जरूरत है। बजरंग पांडेय की यह कहानी सिर्फ एक एथलीट की नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना की भी है।
अब देखना ये है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में बजरंग क्या कमाल करते हैं और अपने बड़े सपने की ओर कितना आगे बढ़ते हैं।

