लंदन: खेल की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ खिलाड़ी नहीं, एक दौर बन जाते हैं। सेरेना विलियम्स ऐसा ही एक नाम है। चार साल बाद, करीब डेढ़ हजार दिनों के लंबे इंतज़ार के बाद जब वो विंबलडन के हरे-भरे घास के कोर्ट पर लौटीं, तो करोड़ों फैंस की निगाहें उन पर थीं। उम्मीदें बड़ी थीं, क्योंकि यह वापसी सिर्फ एक मैच नहीं, टेनिस की सबसे महान खिलाड़ियों में से एक का फिर से रैकेट थामना था। लेकिन खेल बड़ा बेरहम होता है। 44 साल की इस दिग्गज खिलाड़ी को विंबलडन के पहले ही राउंड में हार का सामना करना पड़ा। और हराने वाली थीं उनसे 24 साल छोटी ऑस्ट्रेलिया की माया जॉइंट, जिन्होंने 6-3, 6-7, 6-3 से मुकाबला अपने नाम कर लिया।
यह हार सिर्फ एक मैच हारना नहीं थी, बल्कि एक लंबा इंतजार और एक खास वापसी का थोड़ा फीका पड़ना था। सेरेना ने साल 2022 में मां बनने के बाद इंटरनेशनल करियर से रिटायरमेंट ले लिया था।
पूरे 1,462 दिनों के बाद वो फिर से चैंपियनशिप में उतरी थीं, और उन्हें लेडीज सिंगल्स और डबल्स कैटेगरी में वाइल्ड कार्ड एंट्री मिली थी। कोर्ट पर उनकी वापसी को लेकर टेनिस जगत में भारी उत्साह था, हर कोई देखना चाहता था कि क्या वो अपने पुराने रंग में दिखेंगी?
लेकिन मैच शुरू होते ही कहानी कुछ और ही निकली। पहले सेट में सेरेना थोड़ी थकी और अपनी लय से बाहर नजर आईं।
माया जॉइंट ने इसका पूरा फायदा उठाया और पहला सेट आसानी से 6-3 से जीत लिया। लगा कि कहानी यहीं खत्म हो जाएगी, लेकिन सेरेना को ऐसे ही महान नहीं कहा जाता।
दूसरे सेट में उन्होंने जबरदस्त वापसी की। दो बार ब्रेक पॉइंट पर पिछड़ने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और गेम को टाई-ब्रेकर तक खींचा।
आखिर में उन्होंने दूसरा सेट 7-6 से जीतकर दिखाया कि उनमें अभी भी वो आग बाकी है। लेकिन टेनिस का खेल सिर्फ कौशल का नहीं, शारीरिक दमखम का भी है।
तीसरे सेट में थकान उन पर हावी हो गई और माया ने आखिरी सेट 6-3 से जीतकर मैच अपने नाम कर लिया। सेरेना ने भले ही मैच गंवा दिया हो, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
मैच के बाद उन्होंने कहा, 'विंबलडन में वापस आना वास्तव में बहुत अच्छा था। मुझे यहां आने की उम्मीद नहीं थी।
माहौल अद्भुत था और मैंने इस पल का पूरा आनंद लिया।' अब उनकी अगली चुनौती अपनी बड़ी बहन वीनस विलियम्स के साथ लेडीज डबल्स कैटेगरी में होगी।
दिमित्रोव की चोट से वापसी, कोर्ट पर बिखेरा जादू
एक तरफ जहां सेरेना की वापसी उम्मीद के मुताबिक नहीं रही, वहीं दूसरी तरफ बुल्गारिया के 35 साल के खिलाड़ी ग्रिगोर दिमित्रोव ने पिछले साल के दर्दनाक अनुभव को धोकर एक शानदार वापसी की। पिछले साल इसी कोर्ट पर यानिक सिनर के खिलाफ दो सेट की बढ़त लेने के बाद उन्हें पेक्टोरल इंजरी (सीने की मांसपेशी में चोट) के कारण मैच से हटना पड़ा था।
वो कोर्ट पर रोते हुए बाहर निकले थे, वो मंजर आज भी कई फैंस को याद होगा।
लेकिन इस बार कहानी अलग थी। दिमित्रोव ने ऑस्ट्रेलिया के डेन स्वीनी को सीधे सेटों में 7-6, 6-3, 7-5 से हराकर अपनी वापसी का ऐलान किया।
उनकी जीत सिर्फ स्कोरबोर्ड पर नहीं थी, बल्कि उनकी आंखों में एक सुकून और फैंस के लिए ऑटोग्राफ देते और तस्वीरें खिंचवाते हुए उनके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। यह वापसी एक खिलाड़ी के जुझारूपन और हार न मानने की भावना की मिसाल थी।
स्वियातेक का संघर्ष और इमोशनल जीत
महिला सिंगल्स की मौजूदा चैंपियन और तीसरी वरीयता प्राप्त पोलैंड की इगा स्वियातेक के लिए भी पहला दौर आसान नहीं रहा। दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी को अमेरिका की टेलर टाउनसेंड के खिलाफ काफी पसीना बहाना पड़ा।
उन्होंने पहला सेट 6-1 से आसानी से जीत लिया, तो लगा कि ये मैच भी बाकी चैंपियंस की तरह एकतरफा होगा। लेकिन टाउनसेंड ने दूसरे सेट में जबरदस्त वापसी करते हुए 2-6 से स्वियातेक को चौंका दिया।
तीसरे सेट में तो ड्रामा और भी बढ़ गया। स्वियातेक ने पहले ही गेम में तीन डबल फॉल्ट कर दिए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने चार ब्रेक पॉइंट बचाए।
यह गेम निर्णायक साबित हुआ और अंततः दो घंटे से अधिक चले इस कड़े मुकाबले को स्वियातेक ने 6-3 से अपने नाम कर लिया। जीत के बाद स्वियातेक इतनी भावुक हो गईं कि कोर्ट पर ही तौलिए से मुंह छिपाकर रोने लगीं।
यह दिखाता है कि टॉप पर बने रहने का दबाव कितना भयानक होता है और हर जीत कितनी महत्वपूर्ण होती है, भले ही वह पहले दौर की ही क्यों न हो।
ब्रिटेन के लिए निराशाजनक दिन, कुछ उम्मीदें बरकरार
मेजबान ब्रिटेन के लिए टूर्नामेंट का दूसरा दिन बेहद निराशाजनक रहा। विंबलडन के इतिहास में 38 साल बाद ऐसा हुआ है, जब पहले ही दौर में ब्रिटेन के 15 खिलाड़ी हारकर बाहर हो गए हैं।
इससे पहले साल 1988 में 16 ब्रिटिश खिलाड़ी पहले दौर में बाहर हुए थे। यह आंकड़ा निश्चित रूप से ब्रिटिश टेनिस प्रेमियों के लिए चिंता का विषय है।
एक साथ इतने खिलाड़ियों का बाहर होना बताता है कि अभी भी जमीनी स्तर पर बहुत काम करने की जरूरत है।
हालांकि, इस निराशाजनक दिन में भी कुछ खिलाड़ियों ने ब्रिटेन की उम्मीदों को जिंदा रखा। केटी स्वान ने रोमानिया की इरिना-कैमेलिया बेगु को 6-4, 6-4 से हराया, जबकि जैकब फर्नली ने दो सेट पिछड़ने के बाद शानदार वापसी करते हुए मैच जीता।
उनके अलावा आर्थर फेरी और जान चोइंस्की ने भी अपने-अपने मैच जीतकर अगले राउंड में जगह बनाई। इन खिलाड़ियों की जीत एक संकेत है कि ब्रिटिश टेनिस में अभी भी प्रतिभा की कमी नहीं है, बस उसे सही मंच और प्रोत्साहन की जरूरत है।
कुल मिलाकर विंबलडन का दूसरा दिन उम्मीदों, निराशाओं, वापसी और संघर्षों का मिश्रण रहा। खेल ऐसे ही तो होते हैं, जहां हर पल कहानी बदलती है।

