मुंबई: भैया, पिछले कुछ सालों से भारतीय सिनेमा में एक नया ट्रेंड चल पड़ा है. दर्शकों को अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी पौराणिक कथाओं से जुड़ी फिल्में खूब भा रही हैं. ‘बाहुबली’ ने जो आग लगाई, उसे ‘कांतारा’ और ‘के.जी.एफ.’ जैसी फिल्मों ने हवा दी और अब हर दूसरा फिल्ममेकर इस मसाले को भुनाने में लगा है. इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ा है – ‘नागबंधम’. ये फिल्म भी सनातन विरासत, इतिहास और इंसान के लालच की तिकड़ी को बड़े पर्दे पर पेश करने का दावा करती है. देखने में तो ये एक धांसू ट्रेजर हंट एडवेंचर लग रही थी, बड़े-बड़े विजुअल्स और कमाल का कॉन्सेप्ट, लेकिन भैया... अक्सर बाहर से दिखने वाली हर चमक असली सोना नहीं होती. ‘नागबंधम’ भी वहीं मात खा गई, जहां अच्छे-खासे कॉन्सेप्ट वाली फिल्में पस्त हो जाती हैं – कमजोर स्क्रीनप्ले और जरूरत से ज्यादा लंबी कहानी में.
फिल्म की शुरुआती हाइप, इसके विजुअल इफेक्ट्स और सनातन के रहस्यों को टटोलने का इसका वादा, सब कुछ बड़ा ही शानदार लगता है. लेकिन जब आप सिनेमा हॉल में बैठते हैं, तो धीरे-धीरे महसूस होता है कि जिस नाव पर आप सवार हुए हैं, उसके खेवनहार कहीं-कहीं रास्ता भूल रहे हैं.
फिल्म की अवधि भी इतनी है कि आपकी घड़ी की सुइयां जैसे रुक सी जाती हैं. अब सवाल ये है कि क्या ‘नागबंधम’ अपने बड़े दावों पर खरी उतर पाई या सिर्फ एक और औसत कोशिश बनकर रह गई?
फिल्म की कहानी: कहां से शुरू हुआ ये झमेला?
कहानी की शुरुआत होती है साल 1962 में, सीधे हिमालय की बर्फीली चोटियों से. यहां दो आर्कियोलॉजिस्ट, जुल्फिकार अली (ऋषभ साहनी) और टेस्ला (जेसन शाह), एक रहस्यमयी 'नागबंधम' की तलाश में भटक रहे हैं.
भटकते-भटकते ये एक ऐसी गुफा तक पहुंच जाते हैं, जहां एक बैरागी महाराज पेड़ में कैद हैं. यही बैरागी जुल्फिकार के सामने एक ऐसा राज खोलता है, जिसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे.
बैरागी बताता है कि जुल्फिकार कोई आज का जुल्फिकार नहीं, बल्कि अपने पिछले जन्म में वो क्रूर अहमद शाह अब्दाली था! अरे बाप रे! और फिर ये बैरागी उसे एक और भयानक लालच देता है – 'पुष्पकमल' और 'नागबंधम' हासिल कर पूरी दुनिया पर राज करने का लालच. बस फिर क्या था, जुल्फिकार की आँखें चमक जाती हैं, और यहीं से शुरू होती है असली आफत.
उधर, जुल्फिकार का अगला निशाना बनता है रुद्र (विराट कर्ण) और उसका परिवार. जुल्फिकार को लगता है कि 'पुष्पकमल' का राज इन्हीं के पास छिपा है.
इस हमले में रुद्र बेचारा अपना पूरा परिवार खो देता है. उसकी दुनिया उजड़ जाती है.
इसी बीच एक और ट्विस्ट आता है, पार्वती (नभा नटेश), जिस पर रुद्र आँख मूंदकर भरोसा करता है, उससे जुड़ा एक बड़ा रहस्य सामने आता है और कहानी एक नया मोड़ ले लेती है. रुद्र अब सिर्फ बदला नहीं चाहता, वो सच की तलाश में भी निकल पड़ता है.
कहानी फ्लैशबैक में जाती है, साल 1756 में. यहां दिखाया जाता है कि कैसे अहमद शाह अब्दाली ने हिंदू मंदिरों पर हमला करके दिव्य 'पुष्पकमल' को हासिल करने की कोशिश की थी.
अब सवाल ये है कि क्या रुद्र अपने परिवार का बदला ले पाएगा? क्या वो 'नागबंधम' और 'पुष्पकमल' को जुल्फिकार के हाथों पड़ने से बचा पाएगा? इन सभी सवालों के जवाब ही फिल्म का क्लाइमैक्स बनाते हैं, जो आपको कुर्सी से बांधे रखने की कोशिश तो करता है, लेकिन कितनी देर तक, ये देखना पड़ेगा.
कलाकारों का प्रदर्शन: कौन चमका, कौन चूका?
सबसे पहले बात करते हैं फिल्म के हीरो रुद्र यानी विराट कर्ण की. भैया, इन्होंने अपने रोल में खूब मेहनत की है, ये साफ दिखता है.
एक्शन सीन्स में तो वो कमाल लगते हैं, पर जब बात इमोशनल या गंभीर दृश्यों की आती है, तो कई बार उनकी एक्टिंग थोड़ी लाउड और ओवरड्रामेटिक लगती है. लगता है कि वो सिर्फ अपनी आवाज नहीं, बल्कि हर एक भावना को भी ऊंचे सुरों में पहुंचाना चाहते हैं.
बतौर लीड एक्टर उनमें संभावनाएं तो हैं, लेकिन अभी उन्हें अपनी एक्टिंग पर और पॉलिश करने की जरूरत है.
लेकिन फिल्म की असली जान बनकर उभरी हैं नभा नटेश. इन्होंने डबल रोल में गजब का काम किया है.
उनकी एक्टिंग नेचुरल लगती है और उनका किरदार कहानी में सबसे बड़ा सरप्राइज लेकर आता है. ईमानदारी से कहें तो वो ही इस कहानी को एक नया आयाम देती हैं और दर्शकों का ध्यान खींचती हैं.
जुल्फिकार और अहमद शाह अब्दाली के रोल में ऋषभ साहनी का लुक तो बहुत प्रभावशाली है. वो डर पैदा करने की कोशिश भी करते हैं, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस में भी कहीं-कहीं वही लाउडनेस दिखती है जो विराट कर्ण में थी.
जगपति बाबू, मुरली शर्मा, महेश मांजरेकर और ऐश्वर्या मेनन जैसे दिग्गज कलाकार अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय करते हैं और कहानी को मजबूती देते हैं.
निर्देशन और तकनीकी पहलू: दिखावट शानदार, पर अंदर क्या?
फिल्म की कहानी, स्क्रीनप्ले और डायरेक्शन की बागडोर अभिषेक नामा ने संभाली है. फिल्म का कॉन्सेप्ट तो भैया एकदम धांसू है, इसमें कोई दो राय नहीं.
शुरुआत शानदार है, सेट डिजाइन, सिनेमैटोग्राफी और वीएफएक्स, सब कुछ बड़े पर्दे वाला एहसास देते हैं. खासकर शुरुआती आधे घंटे तक तो फिल्म आपको अपनी सीट से हिलने नहीं देती.
लेकिन भैया, इसके बाद ही असली खेल शुरू होता है. ढीला स्क्रीनप्ले कहानी को बार-बार पटरी से उतारता है.
कभी लगता है कि हम एक ट्रैक पर जा रहे थे, लेकिन फिर कहानी एकदम से कहीं और मुड़ जाती है. इंटरवल से ठीक पहले एक बड़ा सरप्राइज आता है, जो आपको ‘बाहुबली’ और ‘कांतारा’ जैसी फिल्मों की याद दिलाता है.
इस ट्विस्ट के बाद फिल्म कुछ देर के लिए फिर से अपनी रफ्तार पकड़ती है और आपको लगता है कि चलो, अब मजा आएगा. लेकिन दूसरे हाफ में आते-आते कहानी फिर से बिखरने लगती है.
जरूरत से ज्यादा लंबी अवधि भी फिल्म की सबसे बड़ी दुश्मन साबित होती है, जो दर्शकों को थका देती है.
कुल मिलाकर, 'नागबंधम' एक ऐसी फिल्म है जिसमें बहुत पोटेंशियल था. सनातन के रहस्य, एक रोमांचक ट्रेजर हंट और बड़े विजुअल इफेक्ट्स का मिश्रण इसे एक शानदार अनुभव बना सकता था.
लेकिन एक कमजोर और बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले, साथ ही जरूरत से ज्यादा खिंची हुई कहानी, इसके सारे अच्छे इरादों पर पानी फेर देती है. यह एक ऐसी फिल्म है जिसे अगर कसा जाता और अनावश्यक दृश्यों को हटाया जाता, तो शायद ये दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ पाती.
फिलहाल, यह एक ऐसा सफर है जिसमें कुछ चमक है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने का रास्ता थोड़ा भटका हुआ और ऊबड़-खाबड़ है.

