प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का मामला किसी पहेली से कम नहीं है। सालों से चल रही इस कानूनी लड़ाई में हजारों युवा अभ्यर्थियों की उम्मीदें और जिंदगियां दांव पर लगी हैं। कभी कोई परीक्षा का रिजल्ट फंस जाता है, तो कभी एक नंबर के फेर में नियुक्ति लटक जाती है। ऐसा ही एक पेचीदा मामला अब फिर से इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने आया है, जहां एक नंबर के विवाद को लेकर दायर की गई अवमानना याचिका पर सुनवाई के लिए अदालत ने 5 अगस्त की तारीख मुकर्रर की है। अब देखने वाली बात होगी कि क्या इस तारीख पर इन बेचैन अभ्यर्थियों को कोई ठोस राहत मिल पाती है या इंतजार की घड़ी और लंबी खिंचती है।
ये पूरा मामला उन अभ्यर्थियों से जुड़ा है, जिन्हें परीक्षा में एक अतिरिक्त अंक मिलना था। हाईकोर्ट ने पहले ही इस बारे में आदेश दिया था, लेकिन बेसिक शिक्षा परिषद पर आरोप है कि उसने कोर्ट के आदेश की अनदेखी की है।
अब इस अनदेखी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई का नंबर आया है। न्यायमूर्ति विकास बुधवार ने बुधवार को विजय कुमार भारती और अन्य की तरफ से दाखिल अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई के बाद ये अहम तारीख तय की है।
ये सिर्फ एक नंबर की बात नहीं है, बल्कि इस एक नंबर के पीछे हजारों युवाओं का भविष्य अटका हुआ है। एक नंबर से ही कोई मेरिट लिस्ट में अंदर हो जाता है, और कोई बाहर।
इसलिए ये मामला इतना संवेदनशील बन गया है।
एक नंबर का ये अखाड़ा; कैसे शुरू हुई कहानी?
अब थोड़ा पीछे चलते हैं और समझते हैं कि ये ‘एक नंबर विवाद’ आखिर है क्या। उत्तर प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती के लिए एक बड़ी परीक्षा आयोजित की गई थी।
इस परीक्षा के नतीजों और सवालों को लेकर कई विवाद खड़े हुए। इन्हीं विवादों में से एक था, कुछ प्रश्नों के गलत उत्तर या मूल्यांकन में गड़बड़ी का आरोप।
कई अभ्यर्थियों ने दावा किया कि उन्हें एक प्रश्न का सही उत्तर देने के बावजूद उसका अंक नहीं मिला या फिर किसी प्रश्न का गलत उत्तर होने पर भी उसका मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया गया। इसी को लेकर कई अभ्यर्थी इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे थे।
हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई के बाद 12 जनवरी 2023 को एक महत्वपूर्ण आदेश दिया था। कोर्ट ने साफ तौर पर बेसिक शिक्षा परिषद को निर्देश दिया था कि उन अभ्यर्थियों को एक अतिरिक्त अंक का लाभ दिया जाए, जो इसके हकदार हैं।
यह आदेश उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए उम्मीद की एक किरण लेकर आया था, जिन्हें लगता था कि एक नंबर की वजह से उनकी सालों की मेहनत और सपनों पर पानी फिर गया है। उन्हें उम्मीद थी कि अब उन्हें उनकी मेहनत का फल मिलेगा और जल्द ही उन्हें नियुक्ति पत्र मिलेंगे।
कोर्ट का आदेश; फिर भी क्यों लटका मामला?
कोर्ट के आदेश के बाद लगा था कि अब तो मामला सुलझ जाएगा, लेकिन कहानी में ट्विस्ट आ गया। याची अभ्यर्थियों के वकीलों का कहना है कि बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव और अन्य अधिकारियों पर हाईकोर्ट के 12 जनवरी 2023 के आदेश की जानबूझकर अवमानना करने का आरोप है।
अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि परिषद ने यह तो मान लिया कि याची एक अतिरिक्त अंक का हकदार है, लेकिन उसे नियुक्ति देने की प्रक्रिया को बार-बार टाला जा रहा था। परिषद की तरफ से इसका कारण यह बताया जा रहा था कि इस भर्ती से जुड़ी कई कानूनी अपीलें अभी भी लंबित हैं।
साफ शब्दों में कहें तो, परिषद ने माना कि गलती हुई है और अभ्यर्थियों को अंक मिलना चाहिए, लेकिन उन्हें नौकरी देने में हीलाहवाली की जा रही थी।
यह हीलाहवाली ही थी जिसने अभ्यर्थियों को फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर किया। उन्होंने महसूस किया कि कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद उन्हें उनका हक नहीं मिल रहा है।
एक तरफ कोर्ट कह रहा है कि अंक दो, दूसरी तरफ परिषद कह रहा है कि देंगे, पर अभी नहीं, क्योंकि बाकी मामले पेंडिंग हैं। इस स्थिति ने अभ्यर्थियों की परेशानी और बढ़ा दी, क्योंकि उनके सामने असमंजस की स्थिति थी कि आखिर उन्हें नियुक्ति कब मिलेगी।
ये मामला सिर्फ नियमों और कानूनों का नहीं, बल्कि उन युवा चेहरों के भविष्य का भी था जो बरसों से सरकारी नौकरी का सपना पाले हुए थे।
सुप्रीम कोर्ट में क्या चल रहा है?
अब इस कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट। बेसिक शिक्षा परिषद के वकील ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को बताया कि इस पूरी 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती से जुड़ा मुख्य मामला खुद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं, बल्कि एक बड़ा कानूनी दांव-पेंच है जो कई स्तरों पर लड़ा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने बीते 19 मई को इस मामले पर सुनवाई की थी।
इस सुनवाई के दौरान एक बड़ी खबर सामने आई थी। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी इच्छा जताई है कि वो उन अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने पर विचार करने को तैयार है, जो शीर्ष अदालत तक पहुंचे हैं।
यह बयान राज्य सरकार की तरफ से एक महत्वपूर्ण संकेत है। अगर सरकार वाकई ऐसे अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने पर विचार करती है, तो यह कई लोगों के लिए बड़ी राहत की बात होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 जुलाई की तारीख तय की है। इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की जड़ तक जाकर समाधान निकालने की कोशिश कर रहा है।
राज्य सरकार का रुख क्या होता है और सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला सुनाता है, ये जानने के लिए 21 जुलाई का इंतजार करना होगा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्यों टाली सुनवाई?
इलाहाबाद हाईकोर्ट में अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान, बेसिक शिक्षा परिषद के वकील ने एक अहम दलील दी। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट में मुख्य मामले की सुनवाई 21 जुलाई को होनी है और उसमें राज्य सरकार का रुख भी स्पष्ट हो जाएगा, इसलिए इस अवमानना मामले को तब तक के लिए स्थगित कर दिया जाए।
वकील का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही याची (विजय कुमार भारती व अन्य) की स्थिति पर अंतिम रुख स्पष्ट हो पाएगा। इसका मतलब है कि अगर सुप्रीम कोर्ट मुख्य मामले में कोई फैसला देता है या राज्य सरकार का रुख साफ हो जाता है, तो अवमानना मामले पर आगे बढ़ना आसान हो जाएगा।
कोर्ट ने बेसिक शिक्षा परिषद की इस दलील को स्वीकार कर लिया। न्यायमूर्ति विकास बुधवार ने मामले को 5 अगस्त को एडिशनल कॉज लिस्ट में सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।
इसका सीधा सा मतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने का फैसला किया है। यह एक समझदारी भरा कदम है ताकि न्यायिक प्रक्रिया में किसी तरह का विरोधाभास न हो और एक बार में ही सभी लंबित कानूनी उलझनों को सुलझाया जा सके।
अब सभी की निगाहें 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और फिर 5 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। अभ्यर्थियों को उम्मीद है कि इस बार उनकी लंबी लड़ाई का अंत एक संतोषजनक नतीजे के साथ होगा और उन्हें आखिरकार उनका हक मिल पाएगा।

