भोजपुर: बिहार की सियासी जमीन पर इन दिनों जातीय महापंचायतों को लेकर जबरदस्त बवाल कटा हुआ है। मामला भोजपुर से जुड़ा है, जहां 5 जुलाई को एक 'बहुजन महापंचायत' बुलाने की तैयारी चल रही थी। आयोजक कह रहे थे कि ये महापंचायत मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को मजबूती देने के लिए है, खासकर तब जब उनके खिलाफ 'सवर्ण समाज' ने कथित तौर पर एक महापंचायत की थी। लेकिन, इस पूरे मामले में पेंच तब फंसा, जब प्रशासन ने इस महापंचायत को हरी झंडी नहीं दी। इसके बावजूद, बहुजन आर्मी के कुछ समर्थक अड़े हुए थे कि महापंचायत होकर रहेगी। अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या जातीय हिंसा का इतिहास रखने वाले बिहार में इस तरह की जातीय महापंचायतों की कोई जगह होनी चाहिए?
इस बड़े सवाल का जवाब खोजने के लिए भास्कर (यह न्यूज़ एजेंसी) ने बिहार के सभी कुशवाहा विधायकों से संपर्क साधा। कुल 13 विधायकों से बात हो पाई, बाकी ने फोन नहीं उठाया।
मजेदार बात ये रही कि बात करने वाले सभी 13 विधायकों ने एक सुर में कहा — "जातीय महापंचायत की कोई जरूरत नहीं है।" भास्कर भी यही मानता है कि बिहार जैसे राज्य में, जहाँ जातीय संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है, ऐसी जातीय महापंचायतें सिर्फ माहौल खराब करती हैं।
आइए जानते हैं, इस पूरे मामले में किस नेता ने क्या कहा और क्यों ये इतना बड़ा मुद्दा बन गया है।
बहुजन महापंचायत का बुलावा और उसके पीछे की कहानी
दरअसल, 'बहुजन आर्मी' के अध्यक्ष गोल्डन दास ने एक इंटरव्यू में साफ-साफ कहा था कि "यह महापंचायत मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को समर्थन देने के लिए है। पिछड़ा के बेटे सम्राट को हटाने के लिए सवर्ण समाज ने महापंचायत की थी।
उसके जवाब में हम सम्राट चौधरी को मजबूत करने के लिए बहुजन महापंचायत करेंगे। सम्राट के पक्ष में पिछड़ों और दलितों को एकजुट करने के लिए ये जरूरी है।
" उनकी इस घोषणा के बाद बहुजन आर्मी ने 5 जुलाई को भोजपुर में महापंचायत बुला ली थी और इसकी तैयारी भी पूरे जोर-शोर से चल रही थी। बताया जा रहा था कि कुशवाहा समाज का भी कथित तौर पर इस आयोजन को समर्थन मिल रहा था।
लेकिन जैसा कि हमने पहले बताया, प्रशासन ने इस महापंचायत को इजाजत नहीं दी। अब बिना इजाजत के आयोजन करना मतलब सीधे-सीधे कानून से पंगा लेना।
ऐसे में सवाल उठा कि क्या आयोजक पीछे हटेंगे या अपनी बात पर अड़े रहेंगे? इस बीच, राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई और सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक, हर कोई इस मसले पर अपनी राय देने लगा।
NDA के कुशवाहा विधायक; 'सरकार पर भरोसा रखें, महापंचायत क्यों?'
सत्ताधारी दल NDA (जिसमें बीजेपी, जेडीयू, आरएलएम शामिल हैं) के ज्यादातर कुशवाहा विधायकों ने इस प्रस्तावित महापंचायत से पूरी तरह से किनारा कर लिया। उनका साफ कहना था कि सरकार ने इस घटना की न्यायिक जांच का आदेश दे दिया है और लोगों को इसी पर भरोसा रखना चाहिए।
सिलसिलेवार तरीके से जानिए किस विधायक ने क्या कहा:
- भगवान सिंह कुशवाहा: इन्होंने साफ-साफ कहा कि "NDA के सभी पांचों घटक दल किसी खास जाति की राजनीति नहीं करते। हम सभी को साथ लेकर चलते हैं। यह महापंचायत कौन कर रहा है, मुझे नहीं पता।" हालांकि, बाद में 3 जुलाई को जब पत्रकारों ने उनसे इस आयोजन से जुड़े पोस्टर पर उनकी तस्वीर को लेकर सवाल किया, तो वे भड़क गए। ये दिखाता है कि कहीं न कहीं उनका नाम इस महापंचायत से जोड़ा जा रहा था, जिस पर उन्हें आपत्ति थी।
- रामेश्वर कुमार महतो: इनका रुख भी साफ था। उन्होंने कहा, "भोजपुर की घटना पर सरकार ने न्यायिक जांच का आदेश दे दिया है, लोगों को इंतजार करना चाहिए। वहां कोई NDA की बैठक नहीं हो रही थी, जो मेरा जाना जरूरी हो।" मतलब, ये कोई पार्टी का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं है।
- अश्वमेघ देवी: उन्होंने तो इस आयोजन से सीधे पल्ला झाड़ लिया। बोलीं, "मुझे न तो कोई निमंत्रण मिला था और न ही मैं वहां जा रही हूं। 5 जुलाई को रिश्तेदारी में कार्यक्रम है, मैं वहीं रहूंगी।" साफ है कि उनके लिए परिवार का कार्यक्रम ज्यादा जरूरी था।
- रामसेवक सिंह कुशवाहा: इन्होंने भी पार्टी लाइन को दोहराया। कहा, "पार्टी ने ऐसा कोई कार्यक्रम तय नहीं किया है। जब जांच कमेटी बन चुकी है, तो अब धरना-प्रदर्शन और महापंचायत का क्या औचित्य है?" उनका तर्क था कि जब न्यायिक प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, तो ऐसी भीड़ जुटाने का क्या मतलब।
- डॉ. सुनील कुमार कुशवाहा: ये भी अनभिज्ञ दिखे। बोले, "मुझे किसी संगठन या नेता से कोई जानकारी नहीं मिली, न ही कोई निमंत्रण है। जिस कार्यक्रम का पता ही न हो, वहां कोई कैसे जा सकता है?"
- निरंजन मेहता: इनका बयान थोड़ा अलग था, पर समर्थन सीएम सम्राट चौधरी को ही। उन्होंने कहा, "मैं पूरी तरह से सीएम सम्राट चौधरी के साथ खड़ा हूं। वे बुलाएंगे तो जरूर जाऊंगा। लेकिन कोई ऐरा-गैरा महापंचायत करेगा, तो उसमें क्यों जाऊंगा?" यानी, उनकी निष्ठा मुख्यमंत्री के प्रति थी, न कि किसी निजी संगठन के प्रति।
- भीष्म कुशवाहा और रत्नेश कुशवाहा: इन दोनों विधायकों ने भी साफ कर दिया कि उन्हें ऐसे किसी आयोजन की कोई जानकारी ही नहीं है।
- अभिषेक कुमार: इनका बयान थोड़ा लचीला था। उन्होंने कहा, "हमारे क्षेत्र से कई लोग जा रहे हैं। अभी हमारा कार्यक्रम नहीं है, लेकिन सिचुएशन के हिसाब से जा भी सकते हैं।" ये दर्शाता है कि कुछ विधायक सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन स्थिति के हिसाब से अपना रुख बदल सकते हैं।
विपक्षी विधायक बोले; "ये तो BJP की अंदरूनी राजनीति है!"
महागठबंधन (जिसमें राजद, माले, कांग्रेस जैसे दल शामिल हैं) के विधायकों ने इस महापंचायत को लेकर सीधे सरकार को घेरा। उनकी दलील थी कि ये सब बीजेपी की "डराने वाली राजनीति" का हिस्सा है और ये उनकी अंदरूनी गुटबाजी का नतीजा है।
विपक्षी विधायकों का मानना था कि बीजेपी के भीतर ही कोई टकराव है, जिसे इस तरह की महापंचायतों के जरिए भुनाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वो राज्य में जातीय भावनाओं को भड़काकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहती है।
हालांकि, मूल खबर में विपक्षी विधायकों के व्यक्तिगत बयान नहीं दिए गए थे, बल्कि सिर्फ उनका सामूहिक रुख बताया गया था।
बिहार में जातीय महापंचायतों का भविष्य
कुल मिलाकर, इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर बिहार में जातीय राजनीति और उसके संभावित नतीजों पर बहस छेड़ दी है। जब राज्य में जातीय जनगणना जैसे संवेदनशील मुद्दे पर काम हो रहा है, ऐसे में इस तरह की जातीय महापंचायतें कहीं न कहीं सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं।
प्रशासन की इजाजत न मिलना और ज्यादातर विधायकों का इस आयोजन से दूरी बनाना, साफ बताता है कि ऐसी पहल को राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बहुत ज्यादा समर्थन नहीं मिल रहा है। बिहार ने जातीय हिंसा का एक बुरा दौर देखा है, और कोई भी नहीं चाहेगा कि वो इतिहास दोबारा दोहराया जाए।
अब देखना ये है कि 5 जुलाई को क्या होता है, क्या आयोजक अपनी जिद पर अड़े रहते हैं या फिर प्रशासन की सख्ती के आगे उन्हें झुकना पड़ता है। फिलहाल, भोजपुर में जातीय महापंचायत को लेकर तनाव का माहौल बना हुआ है और प्रशासन हर स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है।

