लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 270 एकड़ जमीन का एक ऐसा किस्सा है, जो पिछले तीन दशक से कागजों और अदालतों में उलझा पड़ा है. शहर के बीचोबीच बसा एक आलीशान ‘शहर’ जिसकी नींव 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर रखी गई, आज वो सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंच गया है. ये सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों की संपत्ति और दशकों पुरानी एक कानूनी लड़ाई है, जिसके नतीजे का इंतजार पूरा शहर कर रहा है.
कहानी शुरू होती है एक समझौते से, जहां नगर निगम ने एक बड़ी कंपनी को जमीन दी थी, मकसद था हरियाली बढ़ाना, लेकिन वहां खड़ा हो गया एक पूरा शहर. अब सवाल ये है कि इतनी बड़े पैमाने पर बनी इन इमारतों और बसाहट पर हक किसका है? क्या जमीन निगम की है? या सहारा समूह का दावा मजबूत है, जिसने यहां अरबों रुपये का निवेश करने की बात कही है? फिलहाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होनी है, और उत्तर प्रदेश सरकार की भी इस जमीन पर नजर है, क्योंकि यहां नया विधानसभा परिसर बनाने की तैयारी है.
ये विवाद सिर्फ जमीन की मालकियत का नहीं, बल्कि नियमों को ताक पर रखकर किए गए समझौतों और दशकों तक चली अनदेखी का भी है. एक तरफ लखनऊ नगर निगम है, जो लीज की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगा रहा है.
दूसरी तरफ है सहारा इंडिया, जिसने यहां बड़ा निवेश किया है और अपने कब्जे को वैध बता रहा है. इस पूरी कहानी के केंद्र में है गोमतीनगर का वो विपुल खंड, जहां 270 एकड़ की ये जमीन है.
30 साल पुरानी कहानी: 100 रुपये के स्टाम्प पर 270 एकड़ जमीन
इस पूरे बवाल की जड़ साल 1994 में है. तारीख थी 22 अक्टूबर.
तब लखनऊ नगर निगम ने गोमतीनगर के विपुल खंड में 270 एकड़ जमीन सहारा इंडिया हाउसिंग लिमिटेड को एक लाइसेंस डीड के तहत दी थी. आप यकीन नहीं मानेंगे, लेकिन ये इतनी बड़ी जमीन सिर्फ 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर दी गई थी.
इस समझौते में करीब 170 एकड़ जमीन नगर निगम की थी और बाकी 100 एकड़ लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की. लीज की शर्तें साफ थीं: कंपनी को हर एकड़ के लिए सालाना एक हजार रुपये का शुल्क देना होगा, और सबसे अहम बात ये थी कि पूरे इलाके को 'ग्रीन बेल्ट' के तौर पर विकसित किया जाएगा.
मतलब, यहां हरियाली होनी थी, शहर के फेफड़े बनने थे, लेकिन हुआ कुछ और ही.
इस लीज की वैधता पर सवाल शुरू से ही उठ रहे थे. मामले में याचिकाकर्ता अधिवक्ता बीके सिंह इस पूरे समझौते को नियमों के खिलाफ बताते हैं.
उनका दावा है कि इतनी बड़ी जमीन को 30 साल के लिए सिर्फ 100 रुपये के स्टाम्प पर आवंटित करना LDA के नियमों के हिसाब से बिल्कुल गलत था. उनके मुताबिक, नियमों को दरकिनार करते हुए यह जमीन सहारा को दे दी गई थी.
कोई रजिस्टर्ड डीड नहीं हुई, केवल स्टांप पर लीज दे दी गई और वो भी इतने मामूली किराये पर. उनका आरोप है कि इतने बड़े जमीन आवंटन में जो प्रक्रियाएं अपनाई जानी थीं, उनका पालन नहीं किया गया.
ग्रीन बेल्ट की जगह 'सहारा शहर' और करोड़ों का निवेश
लीज की शर्तों के उलट, ग्रीन बेल्ट के बजाय इस 270 एकड़ जमीन पर धीरे-धीरे एक पूरा 'सहारा शहर' बस गया. यहां रिहायशी और व्यावसायिक इमारतें खड़ी हो गईं.
इस परिसर के अंदर सहारा समूह के मुखिया सुब्रत रॉय का एक आलीशान महल भी बना, जिसे 'व्हाइट हाउस' जैसा बताया जाता है. याचिकाकर्ता बीके सिंह आरोप लगाते हैं कि मास्टर प्लान में इस इलाके को शहर की नर्सरी और हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाना था, लेकिन यहां व्यावसायिक गतिविधियां और निर्माण शुरू हो गए, जो लीज की शर्तों के अनुरूप नहीं थे.
अब जब 30 साल की लीज अवधि पूरी हो चुकी है, तब लखनऊ नगर निगम एक्शन में आया है. निगम का आरोप है कि सहारा ने जमीन का उपयोग तय उद्देश्य के हिसाब से नहीं किया और लीज की शर्तों का उल्लंघन किया.
इसी आधार पर, निगम ने लीज को रद्द कर दिया और जमीन पर अपना कब्जा वापस ले लिया. यह कार्रवाई एक बड़े विवाद को जन्म देने वाली थी, जो अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है.
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, सरकार की भी है नजर
नगर निगम की कार्रवाई के बाद सहारा समूह ने इसे 'अवैध कब्जा' बताया है. सहारा का दावा है कि उसने इस परियोजना में करीब 2480 करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश किया है.
कंपनी का कहना है कि बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के जमीन पर कब्जा कर लिया गया है, जो सरासर गलत है. इस पूरे मामले में अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां 31 जुलाई को एक अहम सुनवाई होनी है.
सिर्फ सहारा और नगर निगम ही नहीं, इस जमीन पर उत्तर प्रदेश सरकार की भी नजर है. खबर है कि राज्य सरकार इसी 270 एकड़ जमीन पर एक नया विधानसभा परिसर बनाने की तैयारी में है.
इस महत्वपूर्ण परियोजना की जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) को दी गई है. यानी, एक ही जमीन पर तीन दावेदार – नगर निगम अपना हक जता रहा है, सहारा अपना अरबों का निवेश बता रहा है और सरकार यहां एक नई पहचान खड़ा करना चाहती है.
लखनऊ के इस ऐतिहासिक जमीन विवाद का क्या अंजाम होगा, ये अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगा. शहर और देश, दोनों की नजरें इस पर टिकी हैं.

