रांची: झारखंड में सूचना का अधिकार... ये सिर्फ नाम का अधिकार बनकर रह गया था. आलम ये था कि पिछले करीब पांच साल से सूचना आयोग में सन्नाटा पसरा था, ताले लटके थे, और जनता की अर्जियां धूल फांक रही थीं. लेकिन अब वो दिन गए. लंबी खींचतान और कानूनी अड़चनों के बाद आखिरकार झारखंड राज्य सूचना आयोग ने फिर से सांस ली है.
बुधवार को राजधानी रांची के लोक भवन में एक खास समारोह का आयोजन हुआ. यहां सूबे के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार खुद मौजूद थे.
उन्होंने चार नए सूचना आयुक्तों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई. इन चार नामों के शपथ लेते ही झारखंड का सूचना आयोग करीब पांच साल बाद पूरी तरह से ‘फंक्शनल’ हो गया है, यानी अब यह ठीक से काम करना शुरू कर पाएगा.
लोगों को उम्मीद है कि अब उनके सूचना के अधिकार वाली अर्जियों पर काम तेजी से होगा.
राज्य सरकार ने इन चार नामों की नियुक्ति की अधिसूचना 10 जून को जारी की थी. राज्यपाल की 'शर्तों' के साथ मिली मंजूरी के बाद ही ये संभव हो पाया.
इन चार नए आयुक्तों में वरिष्ठ पत्रकार अनुज सिन्हा, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पूर्व प्रवक्ता तनुज खत्री, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्व मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव अमूल नीरज खलखो शामिल हैं.
पांच साल का लंबा इंतजार, फिर क्यों हुई देरी?
ये कोई मामूली बात नहीं थी कि एक संवैधानिक संस्था पूरे पांच साल तक लगभग ठप्प पड़ी रहे. मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल नवंबर 2019 में ही खत्म हो गया था.
उसके बाद आयोग में केवल एक सूचना आयुक्त हिमांशु शेखर चौधरी बचे थे, जिन्हें कार्यवाहक मुख्य सूचना आयुक्त का जिम्मा सौंपा गया था. लेकिन मई 2020 में उनका कार्यकाल भी पूरा हो गया.
बस, तब से सूचना आयुक्त के सारे पद खाली पड़े थे. आप समझिए, आरटीआई लगाने वालों का क्या हाल होता रहा होगा!
इस निष्क्रियता को लेकर हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सवाल उठे. अदालतों के लगातार दबाव के बाद ही सरकार ने इन पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया को तेज किया.
मुख्य सूचना आयुक्त के पद के लिए 35 से ज्यादा आवेदन आए थे, जबकि सूचना आयुक्तों के लिए तो करीब 300 आवेदन चयन समिति के सामने रखे गए थे. लेकिन इस लंबी प्रक्रिया के बावजूद, अब तक मुख्य सूचना आयुक्त का पद खाली ही पड़ा है, जिस पर अभी नियुक्ति नहीं हो पाई है.
राजभवन और सरकार के बीच 'फाइल गेम'
इन नियुक्तियों का रास्ता इतना आसान नहीं था, जितना लग रहा था. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में 25 मार्च को चयन समिति की एक बैठक हुई थी, जिसमें इन चार नामों पर सहमति बनी थी.
फाइल मंजूरी के लिए राजभवन भेजी गई. लेकिन राज्यपाल संतोष गंगवार ने 1 अप्रैल को फाइल वापस सरकार को लौटा दी.
राज्यपाल महोदय को कुछ सवाल थे. उन्होंने उन उम्मीदवारों की 'राजनीतिक पृष्ठभूमि' पर चिंता जताई.
पूछा कि सूचना आयोग जैसी 'अर्ध-न्यायिक' संस्था में नियुक्त होने वाले लोगों की 'निष्पक्षता' और 'योग्यता' का आकलन कैसे किया गया? चयन प्रक्रिया की 'पारदर्शिता' को लेकर भी सवाल उठे थे. साफ था कि राजभवन चाहता था कि इन महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे लोग बैठें जिन पर कोई उंगली न उठा सके.
सरकार ने जवाब दिया कि चयन समिति ने आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों का पूरा-पूरा पालन किया है. जो नाम भेजे गए हैं, वे पूरी तरह से 'विधिसम्मत' यानी कानूनी रूप से सही हैं.
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. राजभवन ने फिर से कुछ और बिंदुओं पर आपत्ति जताते हुए फाइल को दूसरी बार भी लौटा दिया.
अब सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती थी – क्या नए नाम भेजे जाएं या पुराने पर ही अड़ी रहा जाए? सरकार ने अपने भेजे गए नामों पर भरोसा जताया और तीसरी बार उन्हीं नामों की फाइल राजभवन को भेज दी. आखिर में, इस बार राजभवन ने इन नामों को अपनी मंजूरी दे ही दी.
ये फाइल गेम काफी समय तक चलता रहा, जिससे नियुक्तियां और लेट होती गईं.
कौन हैं ये नए सूचना आयुक्त?
आइए, एक नजर डालते हैं उन चार हस्तियों पर, जिन्होंने शपथ ली है और अब झारखंड के सूचना आयोग को फिर से पटरी पर लाने का जिम्मा उठाएंगे:
- अनुज सिन्हा: एक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं. पत्रकारिता में उनका लंबा अनुभव रहा है, जो उन्हें जनहित के मुद्दों को समझने में मदद करेगा.
- तनुज खत्री: झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पूर्व प्रवक्ता रह चुके हैं. राजनीतिक समझ के साथ-साथ, वे जनता और प्रशासन के बीच समन्वय बनाने में अनुभवी माने जाते हैं.
- शिवपूजन पाठक: भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्व मीडिया प्रभारी रहे हैं. उन्हें राजनीतिक और प्रशासनिक कामकाज की गहरी जानकारी है, जो इस पद के लिए महत्वपूर्ण है.
- अमूल नीरज खलखो: कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव रहे हैं. उनका भी राजनीतिक और सामाजिक अनुभव सूचना आयोग के कामकाज में मददगार साबित होगा.
मुख्य सूचना आयुक्त का पद अब भी खाली, आगे क्या?
चार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के साथ आयोग भले ही 'फंक्शनल' हो गया हो, लेकिन एक बड़ा पद अब भी खाली है – 'मुख्य सूचना आयुक्त' का. आयोग को सही दिशा देने और महत्वपूर्ण फैसलों में अंतिम मुहर लगाने के लिए इस पद का भरना बेहद जरूरी है.
आयोग की फिर से सक्रियता झारखंड के उन लाखों लोगों के लिए एक बड़ी राहत है, जिन्होंने बरसों से अपनी सूचना के अधिकार वाली अर्जियों पर सुनवाई का इंतजार किया है. उम्मीद है कि अब पारदर्शिता की ये गाड़ी अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ेगी और जनता को उनका हक मिलेगा.

