बरेली: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब कहीं जाते हैं, तो पूरे इलाके में एक अलग ही गरमाहट और रौनक आ जाती है। मंगलवार को भी कुछ ऐसा ही हुआ। सुबह-सुबह रामपुर में एक जनसभा को संबोधित करने के बाद सीएम सीधे हेलीकॉप्टर से बरेली पहुंचे। वजह थी एक ऐसे शख्सियत की प्रतिमा का अनावरण, जिन्होंने अपनी कलम और जुबान से रामकथा को घर-घर तक पहुंचाया, वो भी इतनी सरल भाषा में कि बच्चे-बूढ़े सब उनसे जुड़ गए। बात हो रही है प्रसिद्ध कथावाचक और 'राधेश्याम रामायण' के रचयिता पंडित राधेश्याम की, जिनकी प्रतिमा अब बरेली के जीआईसी ऑडिटोरियम में स्थापित हो गई है। यह सिर्फ एक प्रतिमा का अनावरण नहीं, बल्कि एक युगपुरुष की विरासत को नमन करने जैसा था।
सीएम योगी का बरेली दौरा काफी व्यस्त रहा। उनका हेलीकॉप्टर ठीक दोपहर 12:30 बजे बरेली की पुलिस लाइन में उतरा।
वहां पहले से ही इंतजार कर रहे अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। यहां से मुख्यमंत्री सुरक्षा घेरे में अपनी गाड़ी से सीधे जीआईसी ऑडिटोरियम पहुंचे, जहां पंडित राधेश्याम की भव्य प्रतिमा अनावरण के लिए तैयार खड़ी थी।
इस मौके पर जिले के कई बड़े प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद थे, सबकी निगाहें इस ऐतिहासिक क्षण पर टिकी थीं। मुख्यमंत्री ने विधिवत तरीके से प्रतिमा का अनावरण किया, जो बरेली की सांस्कृतिक विरासत को एक नई पहचान देने वाला पल बन गया।
सीएम योगी का बरेली दौरा और आगे का कार्यक्रम
प्रतिमा अनावरण का कार्यक्रम निपटाने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सर्किट हाउस के लिए रवाना हो गए। उनका अगला पड़ाव यहीं था, जहां उनके कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम तय थे।
दोपहर करीब 1:30 बजे से उन्होंने लोक निर्माण विभाग (PWD) के कार्यों की समीक्षा बैठक की। इस दौरान जिले में चल रही विकास परियोजनाओं और उनकी प्रगति पर बारीकी से चर्चा हुई।
इसके बाद उन्होंने नगर निगम के लिए खरीदी गई 51 नई चार पहिया गाड़ियों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया, जिससे शहर की व्यवस्थाएं और सुचारु हो सकेंगी। मुख्यमंत्री ने जनपद में चल रहे विकास कार्यों की प्रगति और कानून व्यवस्था की स्थिति पर भी एक विस्तृत समीक्षा बैठक की।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, शाम 4:15 बजे वे सर्किट हाउस से त्रिशूल एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए और ठीक 4:30 बजे लखनऊ के लिए उड़ान भर गए। यह दौरा केवल एक प्रतिमा के अनावरण तक सीमित नहीं था, बल्कि जिले के विकास और प्रशासन की नब्ज टटोलने का भी एक अहम मौका था।
कौन थे पंडित राधेश्याम जिनकी रामायण घर-घर पहुँची?
अब बात उस शख्सियत की जिसके सम्मान में यह पूरा आयोजन था – पंडित राधेश्याम। उनका जन्म साल 1890 में बरेली में ही हुआ था।
उन्हें देश-दुनिया में सबसे ज्यादा पहचान मिली उनकी 'राधेश्याम रामायण' से। यूं समझ लीजिए कि उन्होंने भगवान राम की कथा को ऐसे पिरोया, ऐसी सरल, सहज और भावपूर्ण भाषा में लिखा कि वह सीधे आम जनमानस के दिल में उतर गई।
उनकी लिखी रामायण दशकों तक देश के लाखों घरों में सुबह-शाम पढ़ी और सुनाई जाती रही है। आज भी कई घरों में बुजुर्गों के हाथ में उनकी रामायण मिल जाएगी, बच्चे उसकी चौपाइयां गुनगुनाते मिल जाएंगे।
सिर्फ रामायण लेखन ही नहीं, पंडित राधेश्याम एक बेहद प्रभावशाली कथावाचक भी थे। उनकी कथा सुनने के लिए लोग दूर-दूर से खिंचे चले आते थे।
उनकी कथा कहने की शैली इतनी खास थी कि लोग उन्हें 'राधेश्याम कथावाचक' के नाम से जानने लगे। उन्होंने 'राधेश्याम कथा वाचक मंडली' नाम से अपनी एक मंडली भी बनाई, जिसके जरिए उन्होंने रामलीलाओं और पौराणिक नाटकों को एक नई दिशा दी, उन्हें एक नई पहचान दिलाई।
उस दौर में उनके लिखे कई नाटक रंगमंच पर बेहद लोकप्रिय हुए। उनकी प्रस्तुतियों में एक अलग ही जादू होता था, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था।
साहित्यिक विरासत और अमर रचनाएं
पंडित राधेश्याम का निधन 1963 में हुआ, लेकिन उनकी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत आज भी हमारे बीच ज़िंदा है। 'राधेश्याम रामायण' सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक परंपरा बन गई है।
धार्मिक आयोजनों में, रामलीलाओं में और घरों में इसे आज भी बड़े श्रद्धा भाव से पढ़ा और सुना जाता है। उनकी प्रतिमा का अनावरण बरेली की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को सम्मान देने की दिशा में एक बहुत महत्वपूर्ण कदम है।
यह बताता है कि कैसे एक कलाकार अपनी कला के माध्यम से अमर हो सकता है, और कैसे उसकी रचनाएं पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती हैं।
पंडित राधेश्याम कथावाचक की मुख्य रचनाएं उनकी 'राधेश्याम रामायण' और उनके लिखे पौराणिक नाटक हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी उनकी भाषा थी।
उन्होंने अपनी रचनाओं में खड़ी बोली, ब्रज और उर्दू का ऐसा मिश्रण इस्तेमाल किया जिसे आम जनता आसानी से समझ सकती थी और गा भी सकती थी। यही वजह थी कि उनकी रामायण उत्तर भारत की रामलीलाओं का एक प्रमुख आधार बन गई।
उनकी रचनाओं में जीवन का सार, भक्ति का भाव और सरल मानवीय मूल्यों का अद्भुत समावेश मिलता है। उन्होंने सिर्फ कहानियां नहीं सुनाईं, बल्कि एक संस्कृति को जीवंत बनाए रखा।
उनकी कुछ सबसे चर्चित पंक्तियां, जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं, उनके लेखन की गहराई और सादगी को दर्शाती हैं। जैसे उनके दोहे में जीवन के संताप मिटाने और राम कृपा से जीवन में प्रतिताप आने की बात कही गई है:
- दोहा:
नाम राम का लीजिए, मिटें सकल संताप। राम कृपा से हो सके, जीवन का प्रतिताप॥
जय-जय रघुनंदन दीनदयाला। करहु कृपा अब नाथ कृपाला॥ दुष्ट दलन रघुवीर तुम्हारे।
जग में गूंजें नाम तुम्हारे॥
श्री रघुनाथ कृपालु दया
इन पंक्तियों में जो सरलता और भक्ति का भाव है, वह पंडित राधेश्याम की लेखन शैली की पहचान है। उनकी यह विरासत आज भी अनमोल है और बरेली की धरती पर उनकी प्रतिमा का लगना, इसी विरासत को सम्मान देने और नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास है।
यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को बताएगी कि कैसे एक व्यक्ति ने अपनी कला और भक्ति से समाज में एक अमिट छाप छोड़ी।

