तिरुवनंतपुरम: केरल और पश्चिम बंगाल के बीच सियासत का खेल तो चलता रहता है, लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग है। खेल कुर्सी या बयानबाजी का नहीं, बल्कि एक जाने-माने पत्रकार के पासपोर्ट का है, जो सरकारी बाबूशाही के जाल में फंस गया है। किस्सा कुछ यूं है कि 'द टेलीग्राफ' के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल पिछले काफी समय से अपने पासपोर्ट को रिन्यू कराने की जद्दोजहद में लगे हैं। उनका आवेदन अधर में लटका है और इसकी वजह है एक पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट, जिसमें कहा गया है कि वोटर लिस्ट में उनका नाम ही नहीं है! अब सोचिए, एक पत्रकार जो तीन दशकों से पत्रकारिता कर रहा है, जिसके पिता जनसेवा के लिए सम्मानित रहे हैं, वो अचानक एक झटके में 'गैर-मतदाता' कैसे हो गया?
ये मामला इतना पेचीदा हो गया है कि इसमें दो राज्यों के 'मुख्यमंत्री' भी कूद पड़े हैं, (जैसा कि खबर में बताया गया है)। दरअसल, केरल के सीएम वी.
डी. सतीशन ने 29 जून को पश्चिम बंगाल के सीएम सुवेंदु अधिकारी को एक चिट्ठी लिखी है।
चिट्ठी में उन्होंने राजगोपाल के पासपोर्ट नवीनीकरण में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सीएम सतीशन ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर इस पत्र की फोटो भी साझा की, जिसमें उन्होंने साफ़-साफ़ लिखा कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने के खिलाफ अपील प्रक्रिया अभी चल ही रही है, लेकिन इस पुलिस रिपोर्ट की वजह से पासपोर्ट रिन्यू होने में देरी हो रही है।
उन्होंने पश्चिम बंगाल के सीएम से आग्रह किया है कि वे इस मामले पर तुरंत ध्यान दें और उचित कदम उठाएं।
वोटर लिस्ट से नाम गायब; पासपोर्ट अटका
आर. राजगोपाल के लिए यह सिर्फ पासपोर्ट का मसला नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है, जिसके तहत लाखों लोगों का नाम वोटर लिस्ट से गायब हो जाता है।
राजगोपाल बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान उनके वोटर लिस्ट से नाम हटा दिए जाने के बाद ही उनके पासपोर्ट नवीनीकरण का आवेदन अटक गया। वह पिछले 25 साल से भी ज्यादा समय से कोलकाता के बालीगंज विधानसभा क्षेत्र में रह रहे हैं।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि जब 2002 की वोटर लिस्ट की जांच की गई, तो उसमें न तो उनका और न ही उनके पिता का नाम मिला। इसी आधार पर उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया, जबकि वे 2010 से लगातार मतदाता रहे हैं और कोलकाता से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित अखबार 'द टेलीग्राफ' के सात साल तक संपादक भी रह चुके हैं।
राजगोपाल इंडिया टुडे से बातचीत में कहते हैं, "मेरे पासपोर्ट के नवीनीकरण में देरी सिर्फ मेरा निजी मामला नहीं है। यह SIR के दौरान वोटर लिस्ट के लिए जुटाए गए आंकड़ों के सरकारी एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाता है।
" उन्होंने कई बार पुलिस अधिकारियों से यह सवाल पूछा कि क्या कोई ऐसा सरकारी आदेश, सर्कुलर या मेमो है, जिसमें पासपोर्ट सत्यापन पूरा होने से पहले यह अनिवार्य हो कि संबंधित व्यक्ति का नाम दोबारा वोटर लिस्ट में दर्ज हो? लेकिन उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। यह एक ऐसा पेच है, जिसमें आम आदमी आसानी से फंस सकता है और सरकारी नियमों के भंवर में गोते लगाता रह सकता है।
राजगोपाल: तीन दशकों का पत्रकारिता सफर
आर. राजगोपाल कोई मामूली शख्सियत नहीं हैं।
केरल के सीएम सतीशन ने अपने पत्र में इस बात का जिक्र भी किया है। उन्होंने लिखा कि राजगोपाल पिछले तीन दशकों से कोलकाता में रहकर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं।
उन्होंने पत्रकारिता करियर में लंबा समय बिताया है और 'द टेलीग्राफ' जैसे बड़े अखबार के संपादक भी रह चुके हैं। उनके पिता प्रोफेसर वी.
रामदास भी केरल में एक जानी-मानी हस्ती थे। वे गांधी स्मारक निधि के राज्य सचिव रहे थे और जनसेवा के लिए उनका काफी सम्मान किया जाता था।
एक ऐसे प्रतिष्ठित परिवार से आने वाले और खुद भी पत्रकारिता में लंबा अनुभव रखने वाले व्यक्ति का नाम अचानक वोटर लिस्ट से गायब हो जाना और उसकी वजह से पासपोर्ट का काम अटक जाना, कई सवाल खड़े करता है। यह दिखाता है कि कैसे कभी-कभी कागजी कार्यवाही और नियमों की पेचीदगियां आम आदमी के लिए कितनी बड़ी समस्या बन जाती हैं, भले ही उसका रसूख या पहचान कितनी भी बड़ी क्यों न हो।
शशि थरूर का समर्थन और कानूनी पेंच
इस पूरे मामले में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी अपनी बात रखी है। उन्होंने केरल के मुख्यमंत्री द्वारा लिखे गए इस पत्र को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर साझा किया और केरल के सीएम के हस्तक्षेप का समर्थन किया।
थरूर ने लिखा, "यह एक मुख्यमंत्री की ओर से दूसरे मुख्यमंत्री को किया गया अहम हस्तक्षेप है।" हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने एक महत्वपूर्ण बिंदु भी उठाया।
उन्होंने आशंका जताई कि हो सकता है इसका जवाब यह मिले कि यह केंद्र सरकार का मामला है और राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। शशि थरूर की यह टिप्पणी इस मामले की जटिलता को दर्शाती है।
पासपोर्ट एक केंद्रीय विषय है, लेकिन उसके सत्यापन में राज्य पुलिस की भूमिका होती है, जो राज्य सरकार के अधीन आती है। ऐसे में यह मामला केंद्र और राज्य के अधिकारों के बीच एक महीन रेखा पर खड़ा है, जहां नियम और प्रक्रियाएं आपस में उलझ सकती हैं।
राजगोपाल के मामले में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जब तक वोटर लिस्ट में उनका नाम दोबारा दर्ज नहीं हो जाता, तब तक पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट नेगेटिव ही आती रहेगी, और जब तक वेरिफिकेशन नेगेटिव आती रहेगी, उनका पासपोर्ट रिन्यू नहीं होगा। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिससे बाहर निकलना किसी भी आम नागरिक के लिए बेहद मुश्किल हो सकता है।
यह घटना सिर्फ एक पत्रकार के पासपोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सभी नागरिकों के लिए एक चेतावनी है, जिनके नाम किसी प्रशासनिक त्रुटि या प्रक्रियागत खामी के कारण वोटर लिस्ट से हटा दिए जाते हैं। सवाल यह है कि क्या ऐसे मामलों में कोई 'फास्ट ट्रैक' समाधान या वैकल्पिक सत्यापन प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, ताकि लोगों को अपनी पहचान साबित करने के लिए इतना लंबा संघर्ष न करना पड़े? उम्मीद है कि दोनों 'मुख्यमंत्रियों' के हस्तक्षेप के बाद इस मामले में जल्द कोई समाधान निकलेगा और आर.
राजगोपाल को उनका पासपोर्ट मिल पाएगा।

