शिमला: सोचिए, आपने अपने घर-द्वार, खेत-खलिहान सब कुछ एक बड़े राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के लिए कुर्बान कर दिया हो। बदले में सरकार ने वादा किया हो कि आपको एक नई जगह बसाया जाएगा, जमीन दी जाएगी ताकि आप अपनी जिंदगी फिर से शुरू कर सकें। लेकिन दशकों बीत जाएं और आपको वो जमीन न मिले, या मिले भी तो आपके वादे से 600 किलोमीटर दूर, रेत के धोरों के बीच? हिमाचल प्रदेश के पोंग बांध विस्थापितों की कहानी कुछ ऐसी ही है। अब उनकी तीसरी पीढ़ी अपने हक की लड़ाई लड़ रही है और इस लड़ाई में हिमाचल हाईकोर्ट ने राजस्थान के अधिकारियों को ऐसी फटकार लगाई है कि अब श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर को खुद कोर्ट में पेश होकर जवाब देना होगा। मामला सीधा है – वादा था श्रीगंगानगर में जमीन का, दे दी जैसलमेर में।
बात सिर्फ जमीन के एक टुकड़े की नहीं है, बात है एक भरोसे के टूटने की, एक वादे के भुला दिए जाने की। ये उन सैकड़ों परिवारों की गाथा है जिन्होंने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, लेकिन उन्हें मिला सिर्फ दर-दर की ठोकरें और सरकारी दफ्तरों के चक्कर।
अब हिमाचल हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ी नाराजगी दिखाते हुए श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर को 22 जुलाई 2026 को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होने के आदेश दिए हैं।
पोंग बांध: एक कहानी विस्थापन की और अधूरे वादों की
ये किस्सा शुरू होता है दशकों पहले, जब हिमाचल प्रदेश में व्यास नदी पर पोंग बांध बनाया गया था। यह एक विशाल परियोजना थी जिसका मकसद उत्तरी भारत के कई राज्यों को बिजली और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना था।
बांध के बनने से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के सैकड़ों गांवों को नहरों के माध्यम से सिंचाई का पानी मिलता है। वहीं, इससे पैदा होने वाली बिजली से भी हजारों घरों में रोशनी होती है।
लेकिन इस महान परियोजना की एक दुखद कीमत भी थी – हिमाचल प्रदेश के सैकड़ों परिवार बेघर हो गए। उन्हें अपने पैतृक गांव, खेत और घरों से उजाड़ दिया गया।
सरकार ने इन विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए एक योजना बनाई। इस योजना के तहत उन्हें राजस्थान में कृषि भूमि देने का वादा किया गया था ताकि वे अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकें।
शुरुआती योजना के मुताबिक, यह जमीन राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में आवंटित की जानी थी, क्योंकि यह क्षेत्र कृषि के लिए उपयुक्त था और विस्थापितों के लिए बसना आसान होता। लेकिन कहानी में यहीं से एक बड़ा मोड़ आ गया।
जमीन की जंग: श्रीगंगानगर से जैसलमेर तक
समय बीता, साल दर साल गुजरते गए। कई विस्थापित परिवारों को उनकी वादा की गई जमीन मिली ही नहीं।
और जिन्हें मिली, उनके साथ एक बड़ा मजाक हो गया। राजस्थान के अधिकारियों ने श्रीगंगानगर में जमीन देने के बजाय, उन परिवारों को श्रीगंगानगर से करीब 600 किलोमीटर दूर, राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके जैसलमेर में जमीन आवंटित कर दी।
आप सोच सकते हैं, एक किसान परिवार जिसे उपजाऊ जमीन का वादा किया गया था, उसे ऐसी जगह भेज दिया गया जहां की परिस्थितियां बिल्कुल अलग और मुश्किल थीं। यह जमीन आवंटन का मुद्दा ही आज तक विवाद की जड़ बना हुआ है।
विस्थापितों का दावा है कि उन्हें पहले चरण में श्रीगंगानगर में जो जमीन मिलनी थी, वह नहीं दी गई। इसके बजाय उन्हें दूर जैसलमेर में भेज दिया गया, जहां उन्हें बसने और खेती करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
कई परिवारों ने तो इस वजह से जमीन लेने से भी मना कर दिया या अपनी लड़ाई जारी रखी। अब हालत ये है कि जिन बुजुर्गों ने विस्थापन का दर्द सहा था, उनके बच्चे और पोते-पोतियां, यानी तीसरी पीढ़ी, अपने पूर्वजों के हक की लड़ाई लड़ रही है।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख और राजस्थान के अधिकारियों की दलीलें
इस पूरे मामले को हिमाचल हाईकोर्ट में उठाया गया है। अजीत सिंह नाम के एक याचिकाकर्ता, जो पोंग बांध विस्थापितों के अधिकारों को लेकर हाईकोर्ट पहुंचे हैं, इस लड़ाई की अगुवाई कर रहे हैं।
हाल ही में हुई सुनवाई में राजस्थान के अधिकारियों ने अदालत के 15 मई 2025 के आदेश में बदलाव की मांग की। उनकी दलील थी कि याचिकाकर्ताओं को पहले ही जमीन दी जा चुकी है और इसलिए उन्हें व्यक्तिगत पेशी से छूट दी जाए।
लेकिन हाईकोर्ट ने राजस्थान के अधिकारियों की इन दोनों ही मांगों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ-साफ कहा कि राजस्थान के अधिकारियों का लगातार रुख यही रहा है कि पोंग बांध विस्थापितों को पहले चरण में दी जाने वाली जमीन का आवंटन नहीं किया जाए।
कोर्ट ने इस बात को गंभीरता से लिया कि श्रीगंगानगर की जगह जैसलमेर में जमीन दी गई, जिससे विस्थापितों का विवाद अभी भी कायम है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राजस्थान अधिकारियों की अर्जियां खारिज कर दीं।
अगली सुनवाई और उम्मीद की किरण
अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को तय की गई है। इस तारीख पर, श्रीगंगानगर, राजस्थान के जिला कलेक्टर को खुद हिमाचल हाईकोर्ट में उपस्थित होना होगा और इस पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
कोर्ट का यह कड़ा आदेश उन हजारों विस्थापित परिवारों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो दशकों से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि जब श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर कोर्ट में हाजिर होंगे तो वे क्या दलीलें पेश करते हैं और इस दशकों पुराने विवाद का क्या समाधान निकलता है। लेकिन एक बात तो साफ है, हाईकोर्ट ने इस मामले को हल्के में नहीं लिया है और वह चाहता है कि विस्थापितों को उनका वाजिब हक मिले, भले ही इसके लिए कितनी भी लंबी लड़ाई क्यों न लड़नी पड़ी हो।

