पंचकूला: हरियाणा के बहुचर्चित सरकारी फंड घोटाले ने एक बार फिर बैंकिंग गलियारों में हड़कंप मचा दिया है. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने इस बड़े मामले में दो अहम गिरफ्तारियां की हैं, जिनमें IDFC फर्स्ट बैंक के एक एरिया हेड और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के एक ब्रांच मैनेजर का नाम शामिल है. ये गिरफ्तारियां दिखाती हैं कि घोटाले की जड़ें कितनी गहरी हैं और कैसे सरकारी धन के दुरुपयोग के इस खेल में निजी बैंक के अधिकारी भी कथित तौर पर शामिल थे. CBI ने IDFC फर्स्ट बैंक के एरिया हेड शमीम डार और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के मोहाली ब्रांच मैनेजर चरणजीत रंधावा को दबोचा है, जिसके बाद अब कई और बड़े खुलासे होने की उम्मीद जताई जा रही है. इन दोनों की भूमिका सरकारी खातों को खोलने और उनके गलत संचालन में संदिग्ध बताई जा रही है.
आज CBI ने इन दोनों आरोपियों को पंचकूला की अदालत में पेश किया, जहाँ जांच एजेंसी ने तीन दिन की रिमांड की मांग की है. कोर्ट में इस पर सुनवाई चल रही है.
CBI ने अदालत को बताया कि ये पूरा मामला दरअसल पंचकूला के स्टेट विजिलेंस एवं एंटी करप्शन ब्यूरो में दर्ज एक FIR से शुरू हुआ था. बाद में, केंद्र और हरियाणा सरकार की संयुक्त अधिसूचनाओं के आधार पर इस हाई-प्रोफाइल केस को CBI को सौंप दिया गया, ताकि इसकी गहन और निष्पक्ष जांच हो सके.
जांच एजेंसी ने ये भी स्पष्ट किया कि इस मामले में पहले ही 13 आरोपियों और दो निजी फर्मों के खिलाफ अपनी अंतिम रिपोर्ट यानी चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, लेकिन अभी भी कुछ संदिग्ध व्यक्तियों और कई अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच अभी बाकी है, जिसके लिए इन नई गिरफ्तारियों को बेहद अहम माना जा रहा है.
बैंक अधिकारियों की भूमिका और CBI के आरोप
CBI की जांच में जो बातें सामने आई हैं, वे वाकई चौंकाने वाली हैं. जांच एजेंसी के मुताबिक, आरोपी शमीम डार, जो उस समय IDFC फर्स्ट बैंक के सरकारी बैंकिंग समूह में एरिया हेड के पद पर तैनात थे, उनकी भूमिका हरियाणा सरकार के कई विभागों के बैंक खाते खुलवाने और उन्हें मंजूरी देने में बहुत अहम रही है.
CBI के आवेदन में साफ-साफ लिखा है कि डार ने कई सरकारी खातों के KYC (नो योर कस्टमर) डॉक्यूमेंट्स के सत्यापन और ग्राहक की पहचान संबंधी प्रमाणन जैसे संवेदनशील काम खुद अपने हाथों से किए थे. CBI का सीधा आरोप है कि इन्हीं खातों का बाद में कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर संचालन किया गया, और यहीं से सरकारी धन के गबन का बड़ा खेल शुरू हुआ.
वहीं, AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के मोहाली ब्रांच मैनेजर चरणजीत रंधावा की गिरफ्तारी भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जो बताता है कि एक से ज़्यादा बैंक इस पूरे षड्यंत्र का हिस्सा हो सकते हैं. CBI अब इन दोनों से गहराई से पूछताछ करके इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करना चाहती है.
CBI को क्यों चाहिए रिमांड: एक-एक सबूत खंगालने की तैयारी
CBI ने कोर्ट में इन आरोपियों की पुलिस रिमांड की मांग करते हुए कई ठोस और तार्किक वजहें गिनाई हैं, जो बताती हैं कि जांच एजेंसी इस मामले की तह तक जाने के लिए कितनी गंभीर है. एजेंसी का कहना है:
- जांच के दौरान जो दस्तावेजी और डिजिटल साक्ष्य, बैंक रिकॉर्ड और सारे वित्तीय लेन-देन (ट्रांजैक्शन ट्रेल) इकट्ठा किए गए हैं, उनके संबंध में आरोपियों से आमने-सामने पूछताछ करना बेहद ज़रूरी है. इससे कई अनसुलझे सवालों के जवाब मिल सकते हैं और संदिग्ध कड़ियों को जोड़ा जा सकता है.
- CBI ने आरोप लगाया है कि आरोपियों ने बैंक से जुड़े न होने के बावजूद, दूसरे सह-आरोपियों के साथ लगातार और अनधिकृत संपर्क बनाए रखे थे. यह अपने आप में एक आपराधिक साजिश की ओर इशारा करता है और इसकी तह तक जाना आवश्यक है.
- सबसे गंभीर आरोप यह है कि आरोपियों के मोबाइल उपकरणों से आपराधिक साज़िश से संबंधित कई महत्वपूर्ण डिजिटल एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जानबूझकर डिलीट या नष्ट कर दिए गए हैं. जब जांच एजेंसी ने इन डिलीट किए गए डेटा, संचार, पासवर्ड और संबंधित उपकरणों को फिर से हासिल करने में सहयोग मांगा, तो आरोपियों ने कोई सहयोग नहीं किया. इसलिए, इन डिलीट किए गए सबूतों को वापस पाने और सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस हिरासत में पूछताछ अपरिहार्य है.
- CBI ये भी पता लगाना चाहती है कि सह-आरोपियों से इन बैंक अधिकारियों को सरकारी पद का दुरुपयोग करके किए गए एहसानों के बदले कितने और किस प्रकार के अवैध आर्थिक लाभ (अनुचित वित्तीय लाभ) प्राप्त हुए. यह जानना मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के कोण से बेहद अहम है.
- गबन किए गए सरकारी धन की पूरी धनराशि (मनी ट्रेल) का पता लगाना आवश्यक है. पैसा कहां से निकला, किस रास्ते से गुजरा और अंत में कहां पहुंचा, इस पूरी श्रृंखला को समझना जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
- अपराध से अर्जित की गई संपत्तियों, जैसे गबन की गई राशि से खरीदी गई अचल संपत्तियों और सोने जैसी कीमती वस्तुओं की पहचान करके उनकी बरामदगी की जानी है. इसके लिए भी आरोपियों से विस्तृत पुलिस हिरासत में पूछताछ की जरूरत है, ताकि बेनामी संपत्तियों का खुलासा हो सके.
- इस बड़े धोखाधड़ी में शामिल अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका का पता लगाना भी सीबीआई के एजेंडे में है, जिन्होंने इस अपराध को सुविधाजनक बनाया या इससे अवैध लाभ प्राप्त किया. साथ ही, सार्वजनिक अधिकारियों को दी गई अवैध रिश्वत और आर्थिक लाभ से संबंधित जानकारी भी आरोपियों से प्राप्त करनी है, ताकि इस पूरे षड्यंत्र के पीछे के मास्टरमाइंड्स तक पहुंचा जा सके.
इस बड़े घोटाले की परतें अब एक-एक करके खुल रही हैं. CBI की यह कार्रवाई दिखाती है कि सरकारी खजाने में सेंध लगाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वे कितनी भी ऊंची पहुंच रखते हों या कितने भी बड़े पद पर हों.
अब देखना होगा कि अदालत CBI की रिमांड याचिका पर क्या फैसला सुनाती है और आने वाले दिनों में इस जांच से कौन-कौन से नए तथ्य सामने आते हैं.

