लोहरदगा: 30 जून। तारीख ये जब आती है, तो झारखंड की मिट्टी से एक अलग ही जोश और सम्मान की लहर उठती है। ये वो दिन है, जब इतिहास ने करवट ली थी, जब सदियों से सिसकते शोषण और अन्याय के खिलाफ एक ऐसी हुंकार गूंजी थी, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। ये कोई आम दिन नहीं, ये है ‘हूल दिवस’ – संघर्ष, स्वाभिमान और बलिदान की वो अमर गाथा, जिसे आज भी झारखंड के कण-कण में महसूस किया जाता है। ठीक इसी दिन, आज से 169 साल पहले, सन् 1855 में, जब सिदो, कान्हू, चांद और भैरव मुर्मू नाम के चार वीर भाइयों ने अन्याय के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। आज, इसी ऐतिहासिक मौके पर, लोहरदगा में कांग्रेस कमेटी के अल्पसंख्यक विभाग के जिला अध्यक्ष, मोजम्मिल अंसारी ने उन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों को दिल से श्रद्धांजलि दी, जिनकी कुर्बानी ने इस देश की आजादी की नींव में अपनी जानों की आहुति दी थी।
अंसारी साहब ने साफ-साफ कहा कि 30 जून सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि झारखंड के पूरे इतिहास का आइना है। ये उस बेमिसाल संघर्ष का प्रतीक है, जहां लोगों ने अपने मान-सम्मान और हक के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी थी।
उन्होंने याद दिलाया कि कैसे इन चार भाइयों के नेतृत्व में एक जबरदस्त 'हूल आंदोलन' शुरू हुआ, जिसका सीधा मकसद था— अंग्रेजों का राज, महाजनों का अत्याचार और जमींदारी व्यवस्था का काला साया, जो आम लोगों का खून चूस रहा था, उसे जड़ से उखाड़ फेंकना। ये आंदोलन सिर्फ जंगलों और पहाड़ों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी गूंज दूर-दूर तक फैली थी।
हूल आंदोलन: जब अन्याय के खिलाफ फूटा था गुस्सा
ज़रा सोचिए, वो दौर कैसा रहा होगा जब एक तरफ अंग्रेज अपनी ताकत का लोहा मनवा रहे थे, तो दूसरी तरफ महाजन सूदखोरी के जाल में किसानों को फंसा रहे थे। ज़मींदार गरीबों की ज़मीनें हड़प रहे थे और आम जनता की आवाज़ को दबाया जा रहा था।
ऐसे में संथाल परगना की धरती से जो आग निकली, वो केवल आदिवासियों का गुस्सा नहीं था, बल्कि वो हर उस इंसान की आवाज़ थी जो जुल्म और ज्यादती से परेशान था। मोजम्मिल अंसारी ने बड़े जोर देकर कहा कि हूल आंदोलन को सिर्फ एक ‘आदिवासी विद्रोह’ कहना उसकी अहमियत को कम आंकना होगा।
ये तो अन्याय, शोषण और दमन के खिलाफ उठी 'जन-जन की आवाज' थी। इस आंदोलन ने हर किसी को ये सिखाया कि अपने हकों के लिए, अपने सम्मान के लिए और अपनी आज़ादी के लिए कैसे लड़ा जाता है।
सिदो-कान्हू और उनके साथी सिर्फ नेता नहीं थे, वे उस समय के प्रतीक थे, जिन्होंने समाज को एक नई दिशा दी। उनका त्याग और बलिदान आज भी हमारे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
ये आंदोलन कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसने ब्रिटिश हुकूमत को भी सोचने पर मजबूर कर दिया था। आम लोगों ने अपनी पारम्परिक तीर-कमान और हथियारों से, अंग्रेजों की तोपों और बंदूकों का सामना किया।
ये सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं थी, ये इच्छाशक्ति की लड़ाई थी, ये उस अदम्य साहस की कहानी थी, जिसने हार मानने से इनकार कर दिया था। हूल आंदोलन ने दिखाया कि अगर लोग एकजुट हो जाएं, तो बड़ी से बड़ी ताकत को भी झुकाया जा सकता है।
इसी आंदोलन की वजह से बाद में संथाल परगना टेनेंसी एक्ट जैसे कानून बने, जिन्होंने आदिवासियों की ज़मीन पर उनके हकों को सुरक्षित किया।
जल, जंगल, ज़मीन की लड़ाई और आज की प्रासंगिकता
मोजम्मिल अंसारी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हूल दिवस हमें सिर्फ बीते हुए कल को याद करने का मौका नहीं देता, बल्कि ये हमें आज और आने वाले कल के लिए भी एक बड़ा संदेश देता है। ये संदेश है अपने अधिकारों के प्रति हमेशा सजग रहने का, सामाजिक न्याय के लिए डटे रहने का और अपने संविधान से मिले मूल्यों की रक्षा करने का।
उन्होंने बताया कि हूल आंदोलन का जो मूल मकसद था, वो था 'जल, जंगल और जमीन' की रक्षा करना। आदिवासी समाज के लिए जल, जंगल और जमीन सिर्फ संसाधन नहीं हैं, बल्कि ये उनकी पूरी संस्कृति, पहचान और जीवन का आधार हैं।
इन्हीं के दम पर उनका अस्तित्व टिका है। जब इन्हीं पर खतरा आया, तो उन्होंने अपनी जान की बाजी लगा दी।
आज भी झारखंड जैसे राज्यों में, जहाँ प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं और आदिवासी समुदाय बड़ी संख्या में निवास करते हैं, जल, जंगल और जमीन का मुद्दा बहुत अहम है। विकास के नाम पर जब इन संसाधनों को छीना जाता है, तो सीधे तौर पर उन समुदायों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है।
हूल आंदोलन का यह मूल उद्देश्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 1855 में था। अंसारी ने कहा कि हमें एक ऐसे शोषणमुक्त समाज की स्थापना करनी है, जहाँ किसी का हक न मारा जाए और हर किसी को बराबरी का दर्जा मिले।
ये सिर्फ कहने भर की बात नहीं, बल्कि एक ऐसा लक्ष्य है जिसके लिए हर नागरिक को लगातार कोशिश करते रहना होगा।
झारखंड की पहचान और हूल दिवस का संदेश
अंसारी ने यह भी रेखांकित किया कि झारखंड की असली पहचान उसकी समृद्ध आदिवासी संस्कृति में है। यहां की लोक-परंपराएं, त्योहार, कला और संगीत इस मिट्टी की आत्मा हैं।
साथ ही, यहां विभिन्न समुदायों के बीच आपसी भाईचारा और सौहार्द इसकी सबसे बड़ी ताकत है। हूल दिवस हमें इसी एकता की, सामाजिक सद्भाव की और सामूहिक संघर्ष की शक्ति का एहसास कराता है।
ये बताता है कि जब सब मिलकर किसी नेक काम के लिए खड़े होते हैं, तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती।
हूल दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों ने कितनी कुर्बानियां दी हैं ताकि हम आज़ाद और सम्मानजनक जीवन जी सकें। हमें उनकी विरासत को न केवल संजोकर रखना है, बल्कि उसे आगे भी बढ़ाना है।
मोजम्मिल अंसारी के शब्दों में, ये दिन हमें एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करता है, जहां हर व्यक्ति को न्याय मिले, हर कोई बराबरी से रहे और कोई भी किसी का शोषण न करे। ये एक ऐसा समाज हो जहां जल, जंगल और जमीन सभी के लिए सुरक्षित रहें और हर कोई अपने अधिकारों को जानता हो और उनकी रक्षा कर सके।
लोहरदगा में हूल दिवस के मौके पर दी गई यह श्रद्धांजलि सिर्फ अतीत को याद करने भर की बात नहीं थी, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक मजबूत संकल्प की आवाज थी।

