लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसमें एक तरफ बिजली कर्मचारी खड़े हैं तो दूसरी तरफ बिजली महकमे को चलाने वाला पावर कॉरपोरेशन। कहानी आरोप-प्रत्यारोप की है, जहां बिजली कर्मचारी यूनियन सीधे-सीधे पावर कॉरपोरेशन पर ‘शासन’ यानी सरकार को गुमराह करने का इल्जाम लगा रही है। कर्मचारियों का कहना है कि उनकी समस्याओं और संविदा कर्मियों के मुद्दों पर पावर कॉरपोरेशन लगातार सरकार को गलत और भ्रामक जानकारी भेज रहा है, जिसकी वजह से न सिर्फ कर्मचारियों का हक मारा जा रहा है, बल्कि सरकार के सामने भी असलियत नहीं पहुंच पा रही है।
मामला गर्माया हुआ है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने इस पूरे खेल का पर्दाफाश करते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
समिति का दावा है कि जब भी ऊर्जा मंत्री कार्यालय या शासन से कर्मचारियों की समस्याओं से जुड़े पत्रों पर रिपोर्ट मांगी जाती है, तो पावर कॉरपोरेशन जवाब में ऐसी बातें लिख देता है, जो हकीकत से कोसों दूर होती हैं। समिति का सीधा आरोप है कि यह जानबूझकर किया जा रहा है ताकि कर्मचारियों के मुद्दों को दबाया जा सके और प्रबंधन की विफलताओं पर पर्दा डाला जा सके।
कर्मचारियों को छलावे का आरोप: संविदा कर्मियों का मुद्दा
संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने इस पूरे मामले को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि हाल ही में एक बड़ा मुद्दा सामने आया था, जिसमें ऊर्जा निगमों में काम करने वाले संविदा कर्मचारियों को मुख्यमंत्री द्वारा घोषित आउटसोर्स निगम के दायरे में नहीं लाया जा रहा था।
यह एक महत्वपूर्ण घोषणा थी, जिससे संविदा कर्मचारियों को उम्मीद थी कि उनकी स्थिति में सुधार आएगा और उन्हें अधिक सुरक्षा मिलेगी। जब इस शिकायत पर शासन ने पावर कॉरपोरेशन से स्पष्टीकरण मांगा, तो कॉरपोरेशन का जवाब चौंकाने वाला था।
पावर कॉरपोरेशन ने अपने जवाब में कहा कि ‘सिस्टम में सुधार और तकनीकी पुनर्गठन (वर्टिकल व्यवस्था) के कारण आवश्यकता के अनुसार ही संविदा कर्मियों को रखा जा रहा है और यह व्यवस्था तकनीकी दृष्टि से आवश्यक है।’ शैलेंद्र दुबे और समिति के अन्य सदस्यों ने इस जवाब को पूरी तरह से असत्य और गुमराह करने वाला बताया।
उनका कहना है कि इस तरह का जवाब देकर पावर कॉरपोरेशन सिर्फ अपनी मनमानी को जायज ठहराने की कोशिश कर रहा है, जबकि असलियत में संविदा कर्मियों के हितों को नजरअंदाज किया जा रहा है। ‘वर्टिकल व्यवस्था’ के नाम पर कर्मचारियों को उनके हक से वंचित किया जा रहा है, और यह बात सरकार से छिपाई जा रही है।
बातचीत के दावे पर सवाल: तीन साल से खामोशी
सिर्फ संविदा कर्मियों का मुद्दा ही नहीं, बल्कि पावर कॉरपोरेशन पर एक और गंभीर आरोप लगा है, वो है कर्मचारियों के संगठनों से बातचीत को लेकर। पावर कॉरपोरेशन ने शासन को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि वह ‘कर्मचारियों के संगठनों की मांगों पर समय-समय पर वार्ता कर समाधान किया जाता है।
’ लेकिन संघर्ष समिति ने इस दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया है। शैलेंद्र दुबे ने स्पष्ट किया कि यह दावा पूरी तरह से गलत बयानी है और सच्चाई से परे है।
उन्होंने बताया कि पिछले लगभग तीन सालों में पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन ने विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के साथ एक बार भी कोई औपचारिक बातचीत नहीं की है। ऐसे में शासन को यह दावा भेजना कि ‘वार्ता और समाधान’ किया जाता है, न सिर्फ भ्रामक है बल्कि तथ्यविहीन भी है।
दुबे ने कहा, “हमारा स्पष्ट कहना है कि पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन शासन को गुमराह करने की कोशिश न करे। उन्हें सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए और कर्मचारियों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए, न कि मनगढ़ंत दावे पेश करने चाहिए।
”
समिति का कहना है कि यह स्थिति केवल कर्मचारियों के मनोबल को तोड़ने वाली नहीं है, बल्कि इससे पूरे बिजली विभाग के कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। जब कर्मचारियों की बात सुनी ही नहीं जाएगी और उनके मुद्दों पर सरकार को गलत जानकारी दी जाएगी, तो भला कैसे बेहतर परिणाम की उम्मीद की जा सकती है? यह सीधे तौर पर एक ऐसा मामला है, जहां एक सरकारी विभाग खुद अपनी ही सरकार के सामने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहा है।
कर्मचारियों की मांग है कि सरकार इस मामले का संज्ञान ले और पावर कॉरपोरेशन के इन भ्रामक दावों की निष्पक्ष जांच कराए ताकि असलियत सामने आ सके और कर्मचारियों के वाजिब हक उन्हें मिल सकें। यह लड़ाई अब सिर्फ कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच की नहीं रह गई है, बल्कि यह पारदर्शिता और जवाबदेही की भी लड़ाई बन गई है।


