गोरखपुर: एक मां के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि जिस शख्स को उसने अपना जीवनसाथी चुना, वही उसके कलेजे के टुकड़े का कातिल निकला। मामला उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का है, जहां एक सौतेले पिता ने अपने ही दो साल के मासूम बेटे की गला दबाकर बेरहमी से जान ले ली थी। सालों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में अपना बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आरोपी सौतेले पिता की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी अपील को सिरे से खारिज कर दिया है।
यह पूरी कहानी साल 2015 की है, जब चिलुवाताल थाना क्षेत्र में एक खौफनाक वारदात हुई थी। दो साल का मासूम अभिमन्यु, जो अपनी मां मुन्नी देवी और सौतेले पिता प्रदीप उर्फ अमन चौरसिया के साथ रहता था, इस क्रूरता का शिकार हुआ।
मां का आरोप था कि प्रदीप को अभिमन्यु से सख्त नफरत थी और वह अक्सर उस छोटे से बच्चे की पिटाई करता रहता था। उस दिन भी वही हुआ, जिसने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया।
घटना वाले दिन मुन्नी देवी घर के काम में व्यस्त थीं और बर्तन धो रही थीं। तभी अचानक बच्चे की चीख सुनाई दी।
जब तक मुन्नी देवी दौड़कर कमरे में पहुंचीं, तब तक प्रदीप बच्चे की पिटाई कर चुका था और मौके से फरार हो गया था। जब मां ने अपने बेटे को देखा, तो उसकी सांसें थम चुकी थीं।
पुलिस ने जब जांच की और पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, तो सच्चाई और भी भयानक थी। रिपोर्ट में साफ हुआ कि बच्चे के गले पर चोट के निशान थे और हड्डी टूटी हुई थी, जिससे यह साबित हो गया कि दम घुटने की वजह से मासूम की मौत हुई थी।
ट्रायल कोर्ट का फैसला और कानूनी दांवपेंच
इस मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में चली, जहां 27 मई 2022 को कोर्ट ने प्रदीप को आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी पाया। कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई और 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
इसके बाद आरोपी प्रदीप ने अपनी सजा के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति जे.
जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने इस मामले की गहराई से सुनवाई की।
बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट में कई दलीलें पेश कीं। उन्होंने तर्क दिया कि एफआईआर दर्ज कराने में देरी हुई है, कई गवाह अपने बयानों से पलट गए हैं और तहरीर पुलिस के दबाव में लिखवाई गई है।
लेकिन जब कोर्ट ने रिकॉर्ड्स की जांच की, तो पाया कि एफआईआर घटना के महज सवा घंटे के भीतर दर्ज हो गई थी, इसलिए देरी का तर्क पूरी तरह गलत था।
मां की गवाही बनी सबसे बड़ा सबूत
इस केस में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब पांच में से चार गवाह मुकर गए। बचाव पक्ष को लगा कि गवाहों के मुकर जाने से आरोपी बच निकलेगा, लेकिन कोर्ट की सोच अलग थी।
कोर्ट ने माना कि भले ही अन्य गवाह मुकर गए हों, लेकिन मां मुन्नी देवी इस पूरी घटना की इकलौती और सबसे विश्वसनीय चश्मदीद गवाह हैं।
कोर्ट ने अपने फैसले में एक बहुत ही भावनात्मक और तार्किक बात कही। जस्टिस ने कहा कि कोई भी मां अपने बेटे के असली कातिल को बचाने के लिए अपने ही पति पर झूठा आरोप नहीं लगाएगी।
खासकर तब, जब उस महिला ने उस शख्स के लिए अपना पहला रिश्ता तक छोड़ दिया हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज रिश्तेदार होने से कोई गवाह 'हितबद्ध' (interested witness) नहीं हो जाता, बल्कि उसकी गवाही की अहमियत बनी रहती है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई खामी नहीं है। कोर्ट ने प्रदीप की अपील को खारिज कर दिया और उसकी उम्रकैद की सजा को सही ठहराया।
बता दें कि आरोपी प्रदीप 31 अक्टूबर 2015 से ही जेल की सलाखों के पीछे है और अब उसे अपनी उम्र बाकी की जिंदगी जेल में ही गुजारनी होगी।

