रांची: झारखंड में मौसम का मिजाज बदलने वाला है, या यूं कहिए कि बदल चुका है. बंगाल की खाड़ी में एक हलचल हुई है, जिससे एक 'लो प्रेशर एरिया' बनने की संभावना बन गई है. ये खबर जितनी राहत भरी है, उतनी ही कई मायनों में चिंताजनक भी है. राहत इसलिए कि पिछले कुछ दिनों से जो उमस और गर्मी लोगों को सता रही थी, उससे थोड़ी निजात मिलेगी. बारिश होगी, हवा चलेगी, और शायद वज्रपात भी होगा. लेकिन चिंता इस बात की है कि क्या ये बारिश किसानों के लिए काफी होगी? क्या ये मानसून की धीमी रफ्तार को तेज कर पाएगी, या फिर बस एक झोंका बनकर गुजर जाएगी?
मौसम विभाग ने साफ-साफ बता दिया है कि आने वाले कुछ दिन झारखंड के कई इलाकों के लिए काफी अहम हैं. दो और तीन जुलाई को राज्य के पांच जिलों में झमाझम बारिश का अलर्ट जारी किया गया है.
ये जिले हैं लातेहार, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम. यहां कहीं-कहीं भारी बारिश की उम्मीद है.
जबकि बाकी जिलों में हल्की से मध्यम बारिश के साथ तेज हवाएं चलने की संभावना है. ये सिलसिला कम से कम चार जुलाई तक तो बना ही रहेगा.
और फिर पांच और छह जुलाई को रांची समेत कई और जिलों में एक बार फिर अच्छी बारिश की उम्मीद जताई गई है. हालांकि, इस बारिश से अधिकतम तापमान में गिरावट तो आएगी, लेकिन बीच-बीच में उमस भी बनी रह सकती है.
जुलाई में बारिश का 'अल नीनो' कनेक्शन
अब बात करते हैं जुलाई के पूरे महीने की. मौसम विभाग का अनुमान है कि पूरे जुलाई में बारिश या तो सामान्य रहेगी या फिर सामान्य से कम होगी.
ये खबर उन किसानों के लिए अच्छी नहीं है, जो धान की रोपाई के लिए आस लगाए बैठे हैं. विभाग का कहना है कि महीने के पहले 10 दिन तो मानसून एक्टिव रहेगा और अच्छी बारिश की उम्मीद है, लेकिन उसके बाद वर्षा की गतिविधियों में कमी आ सकती है.
इसके पीछे एक बड़ा कारण है प्रशांत महासागर में पनप रहा 'अल नीनो'.
आप सोच रहे होंगे कि ये अल नीनो क्या बला है? दरअसल, अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म होने की एक मौसमी घटना है. इसका सीधा असर दुनियाभर के मौसम पैटर्न पर पड़ता है और भारत के मानसून पर भी इसकी छाया पड़ती है.
जब अल नीनो सक्रिय होता है, तो भारत में मानसून कमजोर पड़ जाता है. यही वजह है कि झारखंड में मानसून पूरी तरह से फैल तो चुका है, लेकिन सभी जिलों में एक समान बारिश नहीं हो रही है.
कहीं ज्यादा, कहीं कम, और कहीं तो सूखा जैसी स्थिति बनी हुई है. इससे किसानों की चिंताएं आसमान छू रही हैं, क्योंकि खेती के लिए लगातार और संतुलित बारिश बेहद जरूरी है, खासकर धान जैसी फसलों के लिए.
पिछले 10 साल का लेखा-जोखा: कब कितनी बरसी मेहरबानियां?
अगर हम पिछले 10 साल के आंकड़ों पर गौर करें, तो जुलाई महीने में सामान्य से अधिक बारिश सिर्फ तीन बार ही दर्ज की गई है. साल 2017 में 81 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई थी, 2021 में 42 प्रतिशत और 2025 में 19 प्रतिशत अधिक बारिश हुई थी.
बाकी के सालों में तो सामान्य से कम बारिश का ही ट्रेंड देखने को मिला है. ये आंकड़े बताते हैं कि जुलाई महीने में झारखंड में बारिश का मिजाज अक्सर 'कंजूस' ही रहा है.
तापमान की बात करें तो पिछले पांच सालों में अधिकतम तापमान 33 से 34 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 21 से 22 डिग्री सेल्सियस के बीच ही रहा है. सिर्फ 2025 में अधिकतम तापमान 31.
8 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया था, जो थोड़ा कम था. हाल के 24 घंटों के आंकड़ों पर नजर डालें तो रांची के तापमान में 3.
4 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि मेदिनीनगर में 1.2 डिग्री की कमी आई है.
लेकिन मौसम विभाग ने अगले दो दिनों में तापमान में फिर से गिरावट की संभावना जताई है, जो बारिश के साथ होने वाले बदलावों को दर्शाती है.
बारिश का सूखा: 50 प्रतिशत तक की कमी
झारखंड में बारिश की मौजूदा स्थिति थोड़ी निराशाजनक है. एक जून से एक जुलाई तक, राज्य में केवल 99.
8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है, जबकि सामान्य वर्षापात 197.8 मिलीमीटर होना चाहिए था.
यानी, सीधे-सीधे लगभग 50 प्रतिशत कम बारिश हुई है. यह एक बड़ा आंकड़ा है जो सूखे जैसी स्थिति की ओर इशारा करता है.
- रांची: यहां 13 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, जो कि चिंता का विषय है.
- दुमका: यह इकलौता जिला है जहां सामान्य से चार प्रतिशत अधिक बारिश हुई है, जो थोड़ी राहत की बात है.
- गढ़वा और साहिबगंज: इन जिलों की स्थिति सबसे खराब बताई जा रही है, जहां बारिश का आंकड़ा काफी नीचे है.
पिछले 24 घंटों में हुई बारिश की बात करें तो रामगढ़ में सबसे अधिक 60.5 मिलीमीटर और बहरागोड़ा में 84.
8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है. ये आंकड़े भले ही कुछ इलाकों के लिए अच्छे हों, लेकिन पूरे राज्य की औसत स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है.
कृषि विशेषज्ञों ने इस स्थिति को देखते हुए किसानों को खास सलाह दी है. उनका कहना है कि किसान निचले खेतों में धान की रोपाई को प्राथमिकता दें, जहां पानी का ठहराव संभव हो.
यह सलाह इसलिए दी जा रही है ताकि कम बारिश की स्थिति में भी फसलों को बचाया जा सके और किसान सूखे की मार से बच सकें.

