गया: बिहार के गयाजी में आजकल जो कहानी चल रही है, वो किसी रोमांचक फिल्म के सीन से कम नहीं है. सोचिए, जंगल के दो विशालकाय राजा, जो झारखंड के घने जंगलों से अपना रास्ता भटककर सीधे रिहायशी इलाकों में आ पहुंचें! जी हां, बीते 48 घंटों से गया जिले के फतेहपुर और मोहनपुर प्रखंड के सीमावर्ती इलाकों में एक हाई-अलर्ट जैसी स्थिति बनी हुई है, और इसकी वजह हैं दो मस्तमौला हाथी, जो अपने झुंड से बिछड़कर यहां आ गए हैं.
इन हाथियों ने किसी फिल्मी सितारे से कम सुर्खियां नहीं बटोरी हैं. जब से ये जंगल से निकलकर आबादी वाले इलाकों के करीब पहुंचे हैं, तब से न सिर्फ ग्रामीणों में दहशत है, बल्कि वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की भी सांसें अटकी हुई हैं.
उनका सबसे बड़ा लक्ष्य यही है कि इन "अतिथि" हाथियों को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, उनके असली घर, यानी झारखंड के जंगलों में वापस भेज दिया जाए.
यह पूरा ड्रामा रविवार की सुबह शुरू हुआ. गन्नी पिपरा गांव के पास के वन क्षेत्र से ये दोनों हाथी अचानक बाहर निकल आए.
कल्पना कीजिए, सुबह-सुबह आप अपने घर के पास जंगल की तरफ देखें और वहां दो भीमकाय हाथी घूमते दिखें! बस, ग्रामीणों का दिल दहल गया. और सबसे अजीब बात ये कि ये दोनों हाथी भी शांत नहीं थे.
झुंड से अलग होने का असर था शायद, वे लगातार अशांत और बेचैन दिख रहे थे. बेचारे, एक सुरक्षित ठिकाने की तलाश में इधर-उधर दौड़ रहे थे, जैसे कोई बच्चा मेला में अपनी मां से बिछड़ गया हो और उसे अपनी राह न सूझ रही हो.
अजनबी इलाके में भटकते गजराज
वन विभाग के अधिकारियों के माथे पर बल इसलिए पड़े हैं, क्योंकि ये हाथी अनजान इलाके में आने के बाद से लगातार अपनी लोकेशन बदल रहे हैं. कभी फतेहपुर की सीमा पर दिखते हैं, तो कभी मोहनपुर की तरफ रुख कर लेते हैं.
मंगलवार देर शाम तक भी ये फतेहपुर-मोहनपुर की सीमा से सटे जंगलों में ही भटकते नजर आए. उन्हें ट्रैक करना और सही दिशा में धकेलना किसी चुनौती से कम नहीं है.
हाथियों के आने की खबर तो ऐसी फैली, जैसे जंगल में आग! देखते ही देखते, बड़ी संख्या में ग्रामीण और बच्चे हाथियों को देखने के लिए इकट्ठा हो गए. अब लोगों की भीड़ जहां होती है, वहां शोरगुल होना तो आम बात है.
और यही शोर-शराबा स्थिति को और भी संवेदनशील बना रहा था. हाथियों को इंसानों की भीड़ और उनका शोर पसंद नहीं आता.
वे नाराज भी हो रहे थे, जिसकी वजह से कभी भी कोई अनहोनी हो सकती थी.
वन विभाग और पुलिस का मोर्चा
हालात की गंभीरता को देखते हुए, गुरपा वन क्षेत्र के रेंजर रजनीश कुमार ने तुरंत मोर्चा संभाला. फतेहपुर थाना पुलिस बल भी उनके साथ मौके पर पहुंच गया.
टीम ने पूरी मुस्तैदी दिखाई. उनका पहला काम था भीड़ को नियंत्रित करना.
उन्होंने सबसे पहले ग्रामीणों को हाथियों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने की सख्त हिदायत दी और भीड़ को खदेड़ा. यह बहुत जरूरी था, क्योंकि अगर हाथी भड़क जाते तो जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता था.
गनीमत ये रही कि पिछले दो दिनों में इन हाथियों ने किसी भी ग्रामीण पर हमला नहीं किया है. न ही किसी की जान गई है और न ही किसी संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचा है.
यह एक राहत की बात है, वरना ऐसे मामलों में अक्सर अप्रिय घटनाएं हो जाती हैं. वन विभाग और पुलिस की त्वरित कार्रवाई और ग्रामीणों को नियंत्रित करने की कोशिशें शायद काम आईं.
झारखंड की तरफ धकेलने की रणनीति
अब सवाल ये है कि इन हाथियों को वापस जंगल में कैसे भेजा जाए? वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस काम में पूरी तरह से जुटे हुए हैं. उन्होंने बताया कि हाथियों को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, सुरक्षित तरीके से झारखंड की सीमा में धकेलने के लिए एक खास रणनीति बनाई गई है.
इसके लिए बाराचट्टी वन क्षेत्र और गुरपा वन क्षेत्र की एक संयुक्त स्पेशल टीम बनाई गई है. यह टीम कोई साधारण टीम नहीं है, बल्कि आधुनिक उपकरणों और अनुभवी ट्रैकर्स से लैस है.
ये स्पेशल टीम लगातार हाथियों के मूवमेंट पर पैनी नजर रख रही है. उनका एक-एक कदम रिकॉर्ड किया जा रहा है, ताकि उनके अगले संभावित कदम का अनुमान लगाया जा सके.
लेकिन इसमें सबसे बड़ी चुनौती है स्थानीय लोगों का सहयोग. वन विभाग ने स्थानीय ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों से बार-बार अपील की है कि वे हाथियों के करीब जाने से बचें.
उनके साथ सेल्फी लेने की कोशिश न करें, न ही उन्हें उकसाएं. ऐसी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है.
इसके अलावा, हाथियों के रास्ते में किसी भी तरह का अवरोध पैदा न करने की भी सलाह दी गई है, ताकि वे शांतिपूर्वक अपने मार्ग पर आगे बढ़ सकें.
इस पूरे ऑपरेशन में सिर्फ बिहार का वन विभाग ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य झारखंड के वन विभाग और वहां का जिला प्रशासन भी समन्वय स्थापित करके मदद कर रहा है. दोनों राज्यों के अधिकारी लगातार संपर्क में हैं, ताकि जब हाथी सीमा पार करें, तो उस समय कोई बाधा न आए और वे सीधे अपने घर, यानी झारखंड के घने जंगलों में लौट सकें.
उम्मीद है कि जल्द ही ये बिछड़े हुए दोस्त अपने घर वापस पहुंच जाएंगे और गया के लोगों की दहशत भी खत्म होगी.

