पूर्णिया: कल्पना कीजिए कि आप सालों से एक ही पद पर काम कर रहे हैं, मेहनत पूरी कर रहे हैं, लेकिन प्रमोशन की फाइल किसी दफ्तर की मेज पर धूल फांक रही है। अब बिहार के विश्वविद्यालयों में कार्यरत उन हज़ारों शिक्षकेतर कर्मियों के लिए एक बड़ी खबर आई है, जो अपनी प्रोन्नति (Promotion) का इंतज़ार कर रहे थे। राजभवन ने अब इस मामले में कड़ा रुख अपनाया है और एक डेडलाइन तय कर दी है।
राज्यपाल सचिवालय ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को साफ-साफ निर्देश दिया है कि कर्मियों की लंबित प्रोन्नति के मामलों को अब और नहीं लटकाया जाए। राजभवन की तरफ से जारी आदेश में कहा गया है कि इस पूरी प्रक्रिया का निष्पादन समयबद्ध तरीके से होना चाहिए।
यानी अब फाइलों का इधर-उधर घूमना बंद होगा और नियम के मुताबिक जो पात्र हैं, उन्हें उनका हक मिलेगा।
इस पूरी कवायद के पीछे की सबसे बड़ी बात यह है कि कई कर्मचारी लंबे समय से अपनी प्रोन्नति के लिए भटक रहे थे। प्रशासनिक देरी की वजह से कई योग्य कर्मी अपने हक से वंचित थे, जिससे उनमें असंतोष था।
इसी को देखते हुए अब ऊपर से सख्त निर्देश जारी किए गए हैं ताकि यूनिवर्सिटी प्रशासन अपनी सुस्ती छोड़े और काम में तेजी लाए।
राजभवन का सख्त निर्देश और समय सीमा
इस मामले में अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों (Vice Chancellors) को एक औपचारिक पत्र जारी किया है। पत्र में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में जितने भी स्वीकृत पद हैं, उनके विरुद्ध कार्यरत शिक्षकेतर कर्मियों की जो भी प्रोन्नति लंबित है, उसे नियमानुसार पूरा किया जाए।
सबसे अहम बात यह है कि राजभवन ने इसके लिए एक आखिरी तारीख तय की है। सभी कुलपतियों को निर्देश दिया गया है कि 15 सितंबर तक हर हाल में लंबित प्रोन्नति के सभी मामलों का निपटारा कर लिया जाए। यह आदेश इस बात की ओर इशारा करता है कि सरकार और राजभवन अब इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेंगे।
कर्मचारियों के लिए क्यों है यह खबर खास
विश्वविद्यालयों में शिक्षकेतर कर्मचारी रीढ़ की हड्डी की तरह होते हैं, लेकिन अक्सर चर्चाओं और प्रमोशन की लिस्ट में उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। प्रोन्नति न होने से न केवल वेतन में बढ़ोतरी रुकती है, बल्कि कर्मचारी के मनोबल पर भी असर पड़ता है।
अब जब राजभवन ने खुद हस्तक्षेप किया है और एक निश्चित समय सीमा तय कर दी है, तो उम्मीद है कि 15 सितंबर तक हजारों कर्मचारियों के चेहरे पर मुस्कान लौटेगी।
कुलपतियों को दिए गए इस निर्देश का सीधा मतलब है कि अब उन्हें अपनी फाइलों का हिसाब देना होगा। यदि किसी विश्वविद्यालय में प्रक्रिया में देरी होती है, तो इसकी जवाबदेही तय की जा सकती है।
फिलहाल, सभी विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक गलियारों में इस पत्र को लेकर हलचल तेज है और प्रोन्नति की प्रक्रियाओं को तेज करने की तैयारी शुरू हो गई है।
राजभवन के इस कदम से अब यह स्पष्ट है कि स्वीकृत पदों के विरुद्ध कार्यरत सभी पात्र कर्मियों को समय सीमा के भीतर उनका प्रमोशन मिल जाएगा। अब सबकी नजरें 15 सितंबर की तारीख पर टिकी हैं, जब यह देखा जाएगा कि कितने विश्वविद्यालयों ने इस डेडलाइन का पालन किया है।

