पूर्णिया: बिहार के नौजवानों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है, खासकर उनके लिए जो यूनिवर्सिटी और कॉलेज में प्रोफेसर बनने का सपना पाले बैठे हैं। बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति अब उतनी सीधी नहीं रहने वाली, जितनी पहले हुआ करती थी। अब सिर्फ डिग्री और इंटरव्यू के भरोसे इस कुर्सी तक पहुंचना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। नए प्रस्तावों के मुताबिक, प्रोफेसर बनने के लिए अब आपको लिखित परीक्षा की अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा और साथ ही अपनी पढ़ाने की कला का भी लाइव डेमो देना होगा। जी हां, आपकी क्लास में पढ़ाने की स्किल की बाकायदा वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी, ताकि कोई भी जुगाड़ से या सिर्फ कागजी योग्यता के दम पर प्रोफेसर की कुर्सी तक न पहुंच सके। यह बदलाव बिहार के उच्च शिक्षा के लिए एक गेम चेंजर साबित हो सकता है।
ये पूरा मामला 'बिहार लोक भवन' की तरफ से तैयार किए गए 'ड्राफ्ट स्टैच्यूट-2026' का है, जिसमें असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति प्रक्रिया में बड़े बदलावों का खाका खींचा गया है। अब तक ज्यादातर यूनिवर्सिटी में होता ये था कि कैंडिडेट्स की शैक्षणिक उपलब्धियों, यानी उनके नंबरों और डिग्रियों को देखा जाता था, और फिर एक इंटरव्यू के आधार पर उनकी किस्मत का फैसला हो जाता था।
लेकिन अब ये तरीका बदलने वाला है। अगर ये नया प्रस्ताव लागू हो गया, तो बिहार उन गिने-चुने राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि क्लास में छात्रों को पढ़ाने की असली क्षमता का भी मूल्यांकन किया जाएगा।
अंकों का नया खेल: लिखित परीक्षा और टीचिंग स्किल टेस्ट
नए ड्राफ्ट के मुताबिक, असिस्टेंट प्रोफेसर के चयन की पूरी प्रक्रिया अब कुल 200 अंकों पर आधारित होगी। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा 175 अंकों की व्यक्तिपरक लिखित परीक्षा का होगा।
यानी, आपका विषय ज्ञान कितना गहरा है, इसकी परख एक लंबी और कड़े एग्जाम के जरिए होगी। इसके बाद जो बाकी 25 अंक बचते हैं, वे इंटरव्यू के लिए तय किए गए हैं।
लेकिन इन 25 अंकों में भी एक ट्विस्ट है – इसमें से पूरे 13 अंक सिर्फ 'टीचिंग स्किल टेस्ट' के लिए रखे गए हैं। इसका मतलब ये है कि इंटरव्यू में आपकी पर्सनालिटी के साथ-साथ ये भी देखा जाएगा कि आप क्लास में खड़े होकर पढ़ाते कैसे हैं, आप विषय को कितनी सरलता से समझा पाते हैं और छात्रों से कैसे जुड़ते हैं।
सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे।
नेट-पीएचडी होने पर भी देना होगा इम्तिहान
पूर्णिया विश्वविद्यालय के मीडिया प्रभारी, प्रोफेसर संतोष कुमार सिंह ने इस प्रस्ताव पर बात करते हुए बताया कि असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए न्यूनतम योग्यता में संबंधित विषय में कम से कम 55 प्रतिशत अंकों के साथ मास्टर डिग्री का होना और साथ ही नेट (National Eligibility Test) या सेट (State Eligibility Test) उत्तीर्ण होना अनिवार्य होगा। लेकिन यहां एक और महत्वपूर्ण बात है।
जो अभ्यर्थी यूजीसी रेगुलेशन-2009 या 2016 के तहत पीएचडी कर चुके हैं, उन्हें भले ही नेट या सेट से छूट मिलती रही हो, लेकिन नए नियम लागू होने के बाद उन्हें भी लिखित परीक्षा और टीचिंग टेस्ट से गुजरना अनिवार्य होगा। यानी, पीएचडी की डिग्री भी अब सीधे नौकरी की गारंटी नहीं देगी, आपको अपनी काबिलियत साबित करनी होगी।
पुराने नियमों को अलविदा, नए बदलावों को न्योता
अभी तक की व्यवस्था में, जैसा कि हमने पहले भी बात की, शैक्षणिक उपलब्धियों और साक्षात्कार को ही मुख्य आधार माना जाता था। लेकिन अब ये साफ हो गया है कि बिहार सरकार उच्च शिक्षा में गुणवत्ता को लेकर गंभीर है और ऐसे शिक्षकों की भर्ती करना चाहती है जो न सिर्फ अपने विषय के ज्ञानी हों, बल्कि उसे प्रभावी ढंग से पढ़ा भी सकें।
'बिहार लोक भवन' ने इस मसौदे पर सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों (वाइस चांसलर्स) से अगले 10 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। इसका मतलब है कि अभी इस ड्राफ्ट पर चर्चा और राय-मशविरा होगा, जिसके बाद इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है।
एक बात और, साल 2025 का जो पूर्व ड्राफ्ट तैयार किया गया था, उसे वापस ले लिया गया है, जिससे साफ है कि सरकार नए और ज्यादा सख्त नियमों की तरफ बढ़ रही है।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में बड़ा कदम
इस नए प्रस्ताव को शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। इसका सीधा फायदा उन उम्मीदवारों को मिलेगा जिनकी विषय पर मजबूत पकड़ है और जिनका संप्रेषण कौशल (Communication Skill) बेहतरीन है।
अब तक अक्सर ऐसी शिकायतें आती थीं कि कई बार योग्य और प्रभावी शिक्षक चयन प्रक्रिया से चूक जाते थे क्योंकि उनके अकादमिक नंबर कम होते थे या वे इंटरव्यू में अपनी बात ठीक से नहीं रख पाते थे। वहीं, कुछ ऐसे भी शिक्षक नियुक्त हो जाते थे जिनका पढ़ाने का तरीका औसत होता था, लेकिन उनके अकादमिक रिकॉर्ड बहुत अच्छे होते थे।
यह नया सिस्टम इस खाई को पाटने का काम करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी में छात्रों को सर्वश्रेष्ठ शिक्षक मिलें। इससे बिहार में उच्च शिक्षा का स्तर निश्चित रूप से सुधरेगा, ऐसी उम्मीद की जा रही है।
अब देखना होगा कि कुलपतियों के सुझाव और आपत्तियों के बाद इस ड्राफ्ट में क्या बदलाव होते हैं और यह कब तक अंतिम रूप ले पाता है।

