भोजपुर: बिहार का भोजपुर जिला इन दिनों एक ऐसे मामले को लेकर गरमाया हुआ है, जिसने पुलिस और न्याय व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां भरत तिवारी नाम के एक शख्स की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत को लेकर उठे विवाद की आंच अब देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गई थी, लेकिन वहां से भी याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 30 जून 2026 को इस मामले में सुनवाई करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे पहले पटना हाईकोर्ट का रुख करें। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि इस एनकाउंटर केस की गूंज राष्ट्रपति भवन तक भी पहुंच चुकी है, जहां से मामले में संज्ञान लेकर जरूरी कार्रवाई का आदेश दिया गया है।
यह कोई सीधा-साधा मामला नहीं है, बल्कि इसमें कई पेच फंसे हुए हैं। एक तरफ पुलिस इसे मुठभेड़ बता रही है, तो दूसरी तरफ याचिकाकर्ता पुलिस की कहानी पर सवाल उठा रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि यह एक सुनियोजित हत्या हो सकती है।
इसी वजह से देश के शीर्ष विधि विशेषज्ञों ने इसकी निष्पक्ष जांच के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) को सौंपने और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की निगरानी में एक स्वतंत्र स्पेशल कमेटी गठित करने की मांग की थी, जिसे लेकर जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: हाईकोर्ट जाने की सलाह
भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट के वकील विशाल तिवारी ने एक जनहित याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में मांग की गई थी कि इस पूरी घटना की सीबीआई से निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
याचिका में यह भी कहा गया था कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की देखरेख में एक स्वतंत्र स्पेशल कमेटी बनाई जानी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और पीड़ितों को न्याय मिल सके।
हालांकि, मंगलवार को जब यह याचिका सुनवाई के लिए आई, तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सीधे सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता विशाल तिवारी को निर्देश दिया कि वे अपनी मांगों को लेकर पहले पटना हाईकोर्ट जाएं।
कानूनी प्रक्रिया के तहत, ऐसे मामलों में निचली अदालतों या संबंधित राज्य के हाईकोर्ट में पहले अपील करना सामान्य प्रक्रिया होती है, जिसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में सीधे हस्तक्षेप करता है। कोर्ट का यह फैसला याचिकाकर्ताओं के लिए तात्कालिक रूप से झटका माना जा रहा है, क्योंकि वे सीधे सुप्रीम कोर्ट से मामले में हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे थे।
राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा मामला
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बावजूद, भरत तिवारी एनकाउंटर मामला अपनी गंभीरता के चलते लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। जानकारी के मुताबिक, यह मामला अब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद, यानी राष्ट्रपति भवन तक भी पहुंच गया है।
सुप्रीम कोर्ट के ही एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने 24 जून को राष्ट्रपति को एक ईमेल के जरिए याचिका भेजी थी। इस याचिका में उन्होंने भरत तिवारी एनकाउंटर मामले की पूरी जानकारी देते हुए राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की थी।
अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने अपनी याचिका में साफ तौर पर कहा था कि उन्होंने भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में दर्ज FIR के आधार पर राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी मुख्य मांग यह है कि FIR में नामजद सभी पुलिस अधिकारियों को, जिनमें संबंधित एसडीपीओ, थानाध्यक्ष और STF (स्पेशल टास्क फोर्स) के जवान शामिल हैं, तत्काल गिरफ्तार किया जाए।
यह मांग इसलिए अहम है क्योंकि आमतौर पर ऐसे मामलों में पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी पर होने का हवाला देकर गिरफ्तारी से बचते रहे हैं, लेकिन याचिकाकर्ता का मानना है कि आरोपों की गंभीरता देखते हुए तत्काल गिरफ्तारी जरूरी है।
राष्ट्रपति सचिवालय का संज्ञान और आगे की कार्रवाई
अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह द्वारा भेजी गई ईमेल याचिका का सोमवार को राष्ट्रपति सचिवालय ने संज्ञान लिया। यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि राष्ट्रपति सचिवालय किसी भी मामले में तभी हस्तक्षेप करता है जब वह राष्ट्रीय महत्व का हो या उसमें गंभीर अनियमितताओं के आरोप हों।
राष्ट्रपति सचिवालय की ओर से बिहार के मुख्य सचिव को मामले में आवश्यक कार्रवाई करने और की गई कार्रवाई से याचिकाकर्ता को भी अवगत कराने का निर्देश दिया गया है।
यह निर्देश दर्शाता है कि मामले की गंभीरता को राष्ट्रपति भवन ने भी गंभीरता से लिया है। अब बिहार सरकार के मुख्य सचिव की जिम्मेदारी होगी कि वे इस मामले में तेजी से और निष्पक्षता से कार्रवाई करवाएं।
साथ ही, उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, उनकी जानकारी याचिकाकर्ता अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह को भी दी जाए। यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता बनाए रखने और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकती है।
क्या हुआ था भरत तिवारी के साथ? याचिकाकर्ताओं के सवाल
दरअसल, यह पूरा विवाद 16 और 17 जून को भोजपुर में हुई घटनाओं से जुड़ा है। पुलिस का दावा है कि 16 जून को जब वे भरत भूषण तिवारी को समझाने पहुंची, तो उसने पुलिसकर्मियों पर पिस्टल तान दी थी।
अगले दिन, यानी 17 जून की सुबह भरत तिवारी ने अपने घर की छत से पुलिस की गाड़ी पर कथित तौर पर फायरिंग भी की थी। पुलिस के मुताबिक, यह एक मुठभेड़ थी जिसमें भरत तिवारी मारा गया।
हालांकि, मामले की तस्वीरों और कुछ शुरुआती बयानों से एक विरोधाभास भी सामने आया है, जिस पर याचिकाकर्ता सवाल उठा रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स और तस्वीरों के अनुसार, भरत ने पुलिस के कहने पर अपनी पिस्टल फेंक दी थी।
अगर ऐसा हुआ था, तो फिर मुठभेड़ में उसकी मौत कैसे हुई, यह एक बड़ा सवाल है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस की कहानी में विरोधाभास है और यह सीधे-सीधे एक फर्जी मुठभेड़ का मामला हो सकता है, जहां पुलिस ने जानबूझकर उसे मारा।
इन्हीं गंभीर आरोपों की वजह से ही सीबीआई जांच, दोषी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी और एक स्वतंत्र समिति की मांग की जा रही है, ताकि इस मामले की सच्चाई और भरत तिवारी की मौत के पीछे की असली वजह सामने आ सके।

